सहज बुद्धि के आधार पर मन पर नियंत्राण रखना ही जीवन का सबसे बड़ा अर्थ है। एडलर लिखते हैं कि ``जीवन का अर्थ है, मैं अपने साथी मनुष्यों में दिलचस्पी लूं, सम्पूर्ण का एक अंश बनूं, मानव-मात्र की भलाई के लिए अपना कर्तव्य-भाग निबाहूं।´´ वे मानते हैं कि दुनिया के सभी विफल मनुष्य ``दूसरों में दिलचस्पी नहीं लेते और सामाजिक भावना नहीं पैदा करते।´´ वे जीवन का अपना निजी अर्थ लगाते हैं।
सच्चाई और वास्तविकता का अर्थ वे मानव के लिए सच्चे और वास्तविक होने से लगाते हैं। अन्य सारी सच्चाइयों को वे व्यर्थ बताते हैं। मन को समाजोन्मुखी बनाने की बात करते एडलर उसकी वैयक्तिकता को नहीं भूलते। वे मानते हैं कि जीवन के उतने ही अर्थ हैं जितने कि मनुष्य। और इसीलिए इन निजी अथों में भूल की गुंजाइश हमेशा रहती है। निजी अर्थ भी सच होते हैं पर वे निजता से सीमित और अधूरे होते हैं और इसलिए भूलों का कारण बनते हैं। इसलिए अथों की कसौटी सामूहिकता है मनमानी नहीं। वे कहते हैं कि जीवन से जुड़ी हर चीज का अर्थ मनुष्य के लिए उसकी आवश्यकता और उससे उसके संबंधों पर निर्भर करता है। चीजों का कोई स्वतंत्र अर्थ नहीं होता।
वे पाते हैं कि वैयक्तिक मनोविज्ञान की सारी समस्याए¡ व्यक्ति के व्यवसाय, समाज और यौन जीवन संबंधी उसके विचारों से जुड़ी होती है। इन सब का हल सहयोग, सन्तुलन और प्रेम-जीवन पर निर्भर करता है। वे कहते हैं कि आपका जीवन तभी सार्थक होगा जब दूसरों के लिए उसका कुछ अर्थ होगा। क्योंकि वैयक्तिक अथों की कभी परीक्षा नहीं ली जा सकती उसकी कसौटी वह व्यक्ति ही होता है और वह खुद अपना महत्व कैसे प्रतिपादित कर सकता है। व्यक्ति का महÙव सामाजिकता- सामूहिकता की कसौटी पर ही कस कर जाना जा सकता है। जीवन के सच्चे अथों की कसौटी साधारण है जिसमें दूसरा हिस्सा बंट सके, ``संपूर्णता में अपना अंश प्रदान´´ कर सकें। `प्रदान को ही वे जीवन का सच्चा अर्थ मानते हैं कि जिस दुनिया में हम काम शुरू करते हैं वह हमें पूर्वजों ने हमें ऐसी प्रदान की है जिसमें हम काम कर सकें और इस दुनिया को आगे वालों के लिए और अनुकूल बनाना ही जीवन का अर्थ हो सकता है। एडलर लिखते हैं कि वैसे असहयोगी लोग जो केवल यही पूछते हैं कि ``मैं जिन्दगी से क्या पा सकता हूं।´´ वह केवल मर ही नहीं चुके हैं, उनका सारा जीवन ही व्यर्थ है।
वे कहते हैं कि वैयक्तिक मनोविज्ञान नियतिवाद के सिद्धान्त को नष्ट कर देता है, कि अपने अनुभवों को जो अर्थ हम देते हैं वही हमारी नियत की रेखा को निधाZरित करता है कि परिस्थितियों को हमेशा परिभाषित करने की जरूरत होती है और यही हमारा भविष्य निधाZरित करता है।
एडलर ने पहली बार शोध कर यह पाया कि विकृत अंगों वाले और बीमार बच्चों में विफलता की संभावना ज्यादा रहती है। जो शरीर वातावरण की मांग को पूरा नहीं कर पाता उसे मन बोझ के रूप में लेता है और यहीं से गड़बड़ी शुरू होती है। उनकी अपंगता के प्रति अगर समाज में या परिवार में सही व्यवहार नहीं मिला तो वे समाजोन्मुख होने की जगह आत्मकेंद्रित होते चले जाकर बर्बाद हो सकते हैं। पर इसे वे कोई नियम नहीं मानते क्योंकि बहुत बार उल्टा भी होता है और जो विकलांग बच्चे सहयोग की ताकत को पहचान लेते हैं और संघर्ष करते रहते हैं वे बहुत बार ठीक-ठाक अंगों वाले बच्चों को भी पीछे छोड़ देते हैं।
विकलांग बच्चों की तरह लाड-प्यार से पले बच्चों में भी बर्बादी के अवसर ज्यादा देखते हैं। ऐसे बच्चे केवल पाना जानते हैं और देना नहीं जान पाते और बोझ बन जाते हैं। इसी तरह उपेक्षा का दंश भी बच्चे को विकसित नहीं होने देता। एडलर बताते हैं कि ``कोई भी दूसरा अनुभव नहीं है जो नि:स्वार्थ प्यार की जगह ले सके।´´ और इस संदर्भ में वे मां की भूमिका को बहुत जरूरी मानते हैं क्योंकि वही बच्चे को बाकी विश्व से जोड़ने वाला जरूरी पुल है। अगर बच्चे ने माता से खुद को उपेक्षित महसूस किए तो इस कमी को शायद ही भरा जा सके। क्योंकि आरम्भ के पांच सालों में ही बच्चे की समझदारी की नींव पड़ती है। किसी व्यक्ति के मानस की विकृतियों को जानने के लिए उसके बचपन के संस्मरणों को एडलर सबसे जरूरी साèान मानते हैं। क्योंकि वहीं उसकी ग्रंथियों की गुत्थी छुपी होती है।
एडलर लिखते हैं कि ``गति की दिशा को पहले ही भांप लेना मन की केंद्रीय शक्ति है।´´ पर चूंकि मन को शरीर में ही रहना है इसलिए वह भी एक जरूरी फैक्टर है क्योंकि गति तो शरीर ही करेगा। पर एडलर गलतियों के लिए मन को ही दोषी ठहराते हैं क्योंकि निर्देशन वही करता है। इसलिए एडलर मन को ही नियंत्रिात करने और उसे समाजोन्मुखी बनाने की बात करते हैं। क्योंकि मन अगर खुद सारे फैसले लेने लगे तो मनमानी होगी उसी सहज बुद्धि के आèाार पर काम करने को तैयार करना ही मनुष्य का अभिष्ट है।
व्यक्ति के मनोविज्ञान की तह में जाते एडलर बताते हैं मनुष्य की हर भावना चाहे वह क्रोध और चिन्ता ही क्यों न हो एक उद्देश्य को लेकर प्रकट होती है। भावना के नाम पर दरअसल आदमी छूट चाहता है अपनी मनमानी की। वे लिखते हैं कि ``हमारा अनुभव बताता है कि क्रोध एक ऐसा ढंग है जिसे किसी व्यक्ति अथवा स्थिति पर काबू करने के लिए बरता जाता है।´´ वे शारीरिक व मानसिक अभिव्यक्तियों को जन्मजात कहकर उसके नाम पर छूट देना नहीं चाहते बल्कि उसकी तह में छुपे उद्देश्यों तक जाना चाहते हैं।
एडलर पाते हैं कि मन का शरीर पर प्रभुत्व रहता है और इसीलिए उसके मन के भावों को हम उसके शारीरिक क्रिया कलापों में अभिव्यक्त होते पाते हैं। एक कमजोर आदमी की कमजोरी उसके आचरण में भी प्रकट होती रहती है और विशाल शरीर का आदमी भी मन से कमजोर होने पर लुंज-पुंज दिखता है। इसलिए वे मन और शरीर को अलग-अलग नहीं उनकी पारस्परिकता में देखने का आग्रह करते हैं। वे कहते हैं कि मन का मस्तिष्क पर भी गहरा प्रभाव रहता है इसलिए सिर पर चोट से अगर कभी मस्तिष्क का एक हिस्सा बेकार हो जाता है तो कभी-कभी मन की ताकत से मस्तिष्क का दूसरा हिस्सा उस कमी को पूरा करने का चमत्कार भी कर दिखाता है।
एडलर कहते हैं कि ``सहयोग की कमियों का ज्ञान ही मनो- विज्ञान है।´´ और मनोविकृतियों को दूर करने के लिए वे सहयोग आधारित जीवन प्रणाली की वकालत करते हैं। क्योंकि व्यक्ति की जीवन प्रणाली में ही उसके मन की गड़बड़ी के सूत्रा होते हैं और उस प्रणाली को बदल कर ही उनसे निजात पाई जा सकती है।
हीनताबोध-श्रेष्ठताबोध और एडलर
हीनभाव यानि इन्फीरिआरिटी काम्प्लैक्स के बारे में एडलर का मानना है कि इसका जिस व्यापक स्तर पर प्रयोग होता है उसके अनुपात में कम ही लोग इसे ठीक से समझ पाते हैं। हीन भाव थोड़ा-बहुत सबमें होता है क्योंकि हर आदमी के आसपास कुछ ऐसी स्थितियां होती हैं जिनको वह सुधारना चाहता है। किसी को हीन भाव से पीिड़त बतलाना उचित नहीं। क्योंकि ऐसा करने से रोगी अपनी उस ग्रंथी से निपटने की जगह उसे और महत्व देते हुए अपनी श्रेश्ठता का प्रदर्शन करेगा। एडलर के अनुसार हर स्नायु-रोगी यानि न्यूरोटिक हीनभाव का शिकार होता है, हां उसका विकार अलग अलग तरीके का हो सकता है। कुछ लोग बोलते समय अपने हाथ पांव को जरूरत से ज्यादा हिलाते हैं ऐसे लोगों का अपनी बोली पर विश्वास कम होता है इसलिए उस पर जोर देने के लिए वह अपने अन्य अंगों को हिलाता है। हीन भाव से ग्रस्त व्यक्ति जरूरी नहीं कि हीन या दबा हुआ दिखे वह इसके विपरीत आचरण भी कर सकता है। जैसे जिस बच्चे में अपने छोटे होने का भय हो वह कुछ तनकर चलने का प्रयास करता दिख सकता है। कोई व्यक्ति अपने हीनभाव को ऐसे ही लगातार लादे नहीं चल सकता वह उससे उबरने का प्रयास अपने तरीके से करता है। संभव है कि वह प्रयास करके भी उससे उबर ना सके और तनाव मेें आ जाए पर वह प्रयास करता जरूर है। अत्याचार और कठोर व्यवहार के कारक के रूप में भी इस हीन भाव की भूमिका तलाशी जा सकती है। अपने कार्य क्षेत्रा में अच्छा प्रदर्शन ना कर पाने वाला व्यक्ति अपने घर या अपने मातहतों के बीच कठोर व्यवहार कर अपने हीन भाव का प्रदर्शन करता है। हीन भाव का विश्लेषण करते एडलर कहते हैं कि हीन भाव से निपट ना पाने वाला व्यक्ति अक्सर श्रेष्ठता की अनुभूति की ओर जाना चाहता है पर यह कोई सकारात्मक प्रयास नहीं है। ऐसा व्यक्ति सफलता की ओर बढ़ने की जगह पराजय से बचने में अधिक समय गंवाता है और ऐसा करते हुए अपना कार्यक्षेत्र सीमित करता आत्महत्या की परिस्थितियां तक पैदा कर लेता है। एडलर के अनुसार आत्महत्या भी श्रेष्ठता भाव की ही एक परिणति है कि उसने आत्महत्या इसलिए की कि अपने जीवन की परिस्थितियों में आत्महंता के पास इससे बेहतर विकल्प नहीं थे। उनके अनुसार आत्महत्या हमेशा एक शिकायत या बदला हुआ करती है कि ऐसा करने वाला अपनी परिस्थितियों का दोश दूसरों के सिर मढ़ता है कि वह उसे समझ नहीं सका। हीन भाव से ग्रस्त व्यक्ति दूसरों पर हावी होना चाहता है चाहे यह काम रोब गांठकर हो या गिड़गिड़ाकर। रोकर या चीखकर जब एक बच्चे को कुछ हासिल होता है तो आगे यही आदत उसे एक उदास प्रकृति का व्यक्ति यानि मेलोन्कोलियॉक बना डालता है। ऐसे लोग सहयोग करने की जगह आंसू बहाकर अपनी बात मनवा लेना चाहते हैं। ऐसे लोग अपनी कमजोरी को अक्सर स्वीकार लेते हैं पर जिस चीज को वे छिपाते हैं वह श्रेष्ठता का भाव होता है। इसी तरह शेखी बधारने वालो बच्चा देखने में श्रेष्ठता का प्रदर्शन कर रहा होता है पर इसके भीतर वही हीन भाव होता है। हस्तमैथुन, स्वप्नदोश, नपुंसकात और विपरीत रति दूसरे लिंग के प्रति अपर्याप्तता के हीनभाव का ही परिणाम होते हैं। इस सबके बावजूद एडलर हीनभाव को मानव जाति की उन्नति के कारक के रूप में देखते हैं। विकास का सार प्रकम ही हीनभाव की उपज है कि आखिर सुख,सुविधा और सुरक्षा के इतने इंतजाम मानव के लिए ही क्यों हैं , क्योंकि नििष्चत ही मानव खुद को स़ष्टि का दुर्बलतम प्राणी समझता है। पशुओं के मुकाबले मनुष्य को बचपन से ही जिस असुरक्षा के बीच अपना जीवन बिताना पड़ता है वह एक ओर इस हीनभाव और दूसरी ओर उसके विकास का कारक है। आदमी के बच्चे केा खड़ा होने और चलने में सालभर लग जाते हैं जबकि पशु शावक जन्म के कुछ देर बाद ही चलने लगता है। इन कठिनाईयेां केा एडलर मानव जाति का सौभग्य मानते हैं। जिसके हल ढूंढने के क्रम में वह न जाने क्या-क्या ढूंढ लेता है। एडलर का मानना है कि साधाण मनुष्य अपनी समस्याओं का हमेशा अच्छे से अच्छा हल ढूंढ लेता है। वह हमेशा दूसरों को कुछ देता है वह किसी पर बोझ नहीं बनता ना उसे अनुकम्पा सामाजिक भावना और सहयोगी रवैये के साथ वह कठिनाईयेां को हल करता आगे बढ़ता चला जाता है। एडलर बताते हैं कि -किसी की जीवन प्रणाली को समझना किसी कवि की कृति को समझने के समान है। कवि को तो शब्दों का प्रयोग करना ही पड़ता है, परन्तु उसका आभिप्राय तो उन शब्दों से कहीं अधिक होता है जिनका वह प्रयोग करता है। उसके अभिप्राय का अधिकांश तो अनुमानगम्य ही होता है, पंक्तियेां के बीच उसकी खोज करनी पड़ती है। यही वैयक्तिक जीवन प्रणाली की दशा है जो अगाध और बहुत उलझी हुई संश्लिष्ठ हुआ करती है। मनोवैज्ञानिक को पंक्तियेां के बीच में पढ़ना होगा, यह आवश्यक होगा कि जीवन का अभिप्राय परखने की कला वह सीखे। ईश्वर तुल्य होने ओर महामानव के विचार को भी एडलर श्रेष्ठताग्रंथि की उपज मानते हुए कहते हैं कि जब जर्मन दार्शनिक नीत्से पागल हो गया था तो वह पत्रों में अपने हस्ताक्षर शहीद लिखकर करता था। उनके अनुसारी प्राय: पागल व्यक्ति अपनी श्रेष्ठता के ध्येय स्पष्ठ रूप में व्यक्त करते हैं। श्रेष्ठताबोध से पीडित व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता। क्योंकि उनके अनुसार प्रेम दुर्बलता की निशानी होता है। ऐसे लोग प्रेम से भागने का बचने का अभ्यास करते हैं। इससे बचने के लिए वह ऐसी स्थिति को उपहास में उड़ा देने की कोशिश करता है। एडलर कहते हैं कि - कई लोग प्रेम में होने पर दुर्बल अनुभव किया करते हैं, और कुछ हद तक वह ठीक होते हैं। उनके अनुसार केवल वही व्यक्ति प्रेम की पारस्परिक निर्भरता से बचे रहने का प्रयत्न करेगा जिसका श्रेष्ठता संबंधी ध्येय यह कहता है - मुझे कभी दुर्बल नहीं होना है, मुझे कभी भी अरक्षित नहीं रहना है। जिस व्यक्ति से ऐसे लोगों को प्रेम होने का भय होता है उनका वे उपहास उड़ाते हैं। बच्चों द्वारा चोरियां किए जाने और दूसरे की बुराई करने को भी वे श्रेष्ठताबोध से जोड़ते हैं। उनका यह भी मानना है कि जहां भी झूठ बोलने का मामला दिखे, हमें उसका कारण कठोर माता अथवा पिता में तलाश करना पड़ेगा। श्रेष्ठता की इस कुंठा को समझने के लिए वे सलाह देते हैं कि हमें खुद को उनकी स्थितियों में रख कर देखना चाहिए तभी हम इसकी तह में जा सकते हैं। कि श्रेष्ठता की ओर जाने का प्रयास ही प्रगति के मूल में है पर कहां से यह बंधन के रूप में बदलने लगता है इस पर विचार करना चाहिए। उनका स्पष्ट मत है कि -जो व्यक्ति जीवन की समस्याओं का वास्तव में सामना कर सकते हैं और उनपर विजय पा सकते हैं वह वही होते हैं जो अपने प्रयत्नों से सभी को लाभ पहुंचाने की प्रवृत्ति दिखाते हैं, जो इस तरह आगे बढ़ते हैं कि दूसरे भी फायदा उठाएं।
सपने हमारी जीवन प्रणाली के हिस्से हैं
सपने को लेकर हमेशा हम एक संशय में रहे हैं कि जैसे वे कोई रहस्य हों। दूसरी ओर सपनों को लेकर एक अतिरेकी विचार यह भी है कि जो सपने नहीं देखता वह बड़ा नहीं हो सकता। पर वैज्ञानिक और मनोचिकित्सक डॉक्टर एल्फ्रेड एडलर को पढ़ने के बाद मुझे अपने विचारों को बदलना पड़ा और लंबे समय से चला आ रहा कुहासा छंटा। एडलर यह साफ करते हैं कि स्वप्न हमारी जीवन प्रणाली के हिस्से होते हैं और उनका व्यक्ति के मूल स्वभाव से अलग कोई अर्थ नहीं होता।
वे बताते हैं कि सपने अक्सर हमें धोखा देते हैं क्यों कि हम उन्हें समझने की जहमत कम उठाते हैं और उनका भ्रमप्रर्ण अथै लगाना आसान होता है। पर अगर हम हम उन पर ध्यान देने लगें तो वे हमें धोखा नहीं दे पाएंगे। उनके अनुसार आदमी को अपनी सहज बुद्धि के अनुसार चलना चाहिए और सपनों के धोखे से बचना चाहिए क्योंकि वे अक्सर एक आसान हल की ओर ईशारा करते हैं।
अधिकांश लोग उड़ने के सपने देखते हैं, एडलर बताते हैं कि हम अपनी समस्याओं का हल बिना मिहनत किए पा लेना चाहते हैं। सपने एक तरह से तोष देते हैं कि यथार्थ में ना सही आपने सपने में तो अपनी समस्या का हल पा ही लिया। इसी तरह लोग गाड़ी छूटने का सपना देखते हैं यह इंगित करता है कि हम बिना प्रयास किए अपनी समस्या का हल पा लेना चाहते हैं। मुझे कुछ देर से इस तरह चलना चाहिए कि गाड़ी छूट जाए और उसका सामना ना करना पड़े।
इसी तरह किसी समस्या को सामने पा आ असहज हो उठते हैं तो आपको परीक्षा के सपने आ सकते हैं। इसका मतलब कुछ लोगों के लिए यह हो सकता है कि उस समस्या को सामने पा व्यक्ति परेशानी में पड़ गया और उसे परीक्षा की तरह ले रहा है। कुछ लोगों के लिए जो ऐसी समस्याओं से आसानी से पार पा चुके हैं इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि यह भी एक परीक्षा है और वो इससे पार पा लेंगे। इस तरह सपनों के अर्थ उस व्यक्ति के जीवन संदर्भों में ही निकलेंगे उसका कोई आकाशी रहस्यमय अर्थ नहीं होगा।
एडलर के अनुसार हर सपने का अर्थ खुद को मदहोश करना और आत्मसम्मोहित करते हुए मूल समस्या से बच कर निकलने का प्रयास करना है कि सपने आत्मवंचना को बल देते हैं। कि स्वप्न भी सोद्देश्य होते हैं। सपने में व्यक्ति अपनी स्मृति से ही चुनाव करते हैं जो श्रेष्ठता के उसके निजी ध्येय का पक्ष लेते हैं। इस तरह सपने में हम उन्हीं घटनाओं में से चुनाव करते हैं जो हमारी जीवन प्रणाली से मेल खाते हैं।
महान मनोविश्लेषक फ्रायड का मत है कि सपनों का निर्माण अलंकारों और प्रतीकों से होता है। एडलर सवाल करते हैं कि आखिर सपने अलंकारों और प्रतीकों की जगह सरल सीधी भाषा में क्यों नहीं व्यक्त् होते। वे कहते हैं कि अलंकार वाणी के भूषण माने जाते हैं पर उनका प्रयोग कर हम हमेशा अपने को धोखा देते हैं। जारी...
Wednesday, November 26, 2008
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