Friday, November 7, 2008

चेखव और लीडिया - एक प्रेम कथा

उम्र भर एक मुलाकात चली आती है ...



अपनी भयाक्रांत शीर्षक कविता में होर्खे लुइस बोर्खेस लिखते हैं - यह प्रेम है।मुझे गोपन रहना होगा अथवा पलायन करना होगा। इस कैदखाने की दीवारें बढ़ती जाती हैं, जैसे किसी डरावने स्‍वप्‍न में।
लीडिया एविलोव की पुस्‍तक मेरी जिन्‍दगी में चेखव को पढते हुए जैसे प्‍यार के निहितार्थ नये सिरों से खुलते हैं। अपने सहज, सरल ढंग से। कैदखाने की दीवारें और डरावने स्‍वप्‍न वहां भी हैं पर वे बोर्खेस की कविता की तरह भयाक्रांत नहीं करते बल्कि खीचते हैं जैसे समुद्र खींचता है चाहे आप तैरना जानते हों या ना जानते हों ...। इसे पढते हुए लगता है कि प्‍यार अपने अनुभवों के प्रति एक निजी आ्ग्रह है जो रूढिगत आचरणों को दरकिनार करता अपनी रौ में बढता जाता है। यह कबीर की आंखिन देखी है जिसे आंख वाला दुनियावी दबाव में अपनी नजरों से दूर नहीं कर पाता, चाहे इसकी जो कीमत उठानी पडे।
इस पुस्‍तक को पढते लगा जैसे सारा लेखन आदमी के प्‍यार की ही अभिव्‍यक्ति होता है। अपने देखे-गुने हुए के प्रति एक सच्‍ची जिच से ही लेखन पैदा होता है। चेखव कहते हैं - लेखक को वही लिखना चाहिए जो उसने देखा और भोगा है-पूरी सच्‍चाई और ईमानदारी के साथ। ... जीवन का अनुभव विचार को जन्‍म दे सकता है लेकिन विचार अनुभव को जन्‍म नहीं दे सकता। यहां विचार एक रूढि की तरह आता है और अनुभव विचार का पर्यायवाची हो जाता है। मतलब हर बार नये समय संदर्भों में अनुभवों के आधार पर विचारों का पुनरमूल्‍यांकन करने की जो हिम्‍मत करता है वही लेखक होता है वही प्रेमी होता है। और यह मूल्‍यांकन पूरी जटिलात और समय के विडंबना बोध को साथ लेकर चलता है वह विचारों का सरलीकरण नहीं करता।
जब लीडिया की पहली मुलाकात हुई थी तब वह पच्‍चीस की और एक बच्‍चे की मां थी , चेखव तब अटठाईस के थे और अविवाहित। लीडिया लिखती है- ... पर उस एक नजर में क्‍या कुछ नहीं था। ... उमंग,उल्‍लास और आनंद की जैसे हजार आतिशें जल उठीं।
जब चेखव को पता चला कि उनका एक बच्‍चा भी है तो उसकी आंखों में देखते उन्‍होंने पूछा- आपका बेटा भी है... अरे वाह ...।
लीडिया में लेखिका बनने की गहरी ईच्‍छा थी, जब उसकी शादी तय हुई तो मासिक रूसी विचार के संपादक गाल्‍तसेव ने कहा कि - बस फिर तो हो गया। अब भूल जाओ कि लेखिका-वेखिका बनोगी...। तब लीडिया ने संकल्‍प लिया कि वह शादी को लेखन में बाधा नहीं बनने देगी। पर बाद उसे लगा कि वह उसकी भूल थी कि विवाहित जीवन में लेखन के लिए समय ही नहीं था। पर यह चीज कहीं न कहीं उसके भीतर बैठी रही। शादी के बाद भी वह कहानियां लिखती रही छपवाती रही और अपने प्रिय लेखक चेखव या चेखान्‍ते को लेकर उसका प्रेम दस सालों तक बना रहा। अंतिम सालों में उसने चेखव की कहानियों के संकलन में उनकी काफी मदद भी की और उसकी लेखकीय जिद के रूप में हम इस खूबसूरत किताब को देख सकते हैं जिसमें चेखव से कुल आठ-दस मुलाकातों को जैसे पुनरजीवित कर दिया गया हो।
अपने भीतर के लेखक को बचाने की जिद में लीडिया ने अपने पति से तलाक की भी मांग की। तब वह पहले बच्‍चे की मां बनने वाली थी और चेखव से उसका परिचय भी नहीं हुआ था। पति ने समझाया कि यह गलतफहमी पर टिकी जिद है और लीडिया ने भी सोचा और पाया कि उसका पति उसके लिए कुछ भी उठा नहीं रखता, पर प्रेम के यह क्‍या मायने हुए कि एक दूसरे की तारीफ में गर्क होते रहें , प्रेम तो मिलकर बाकी दुनिया के लिए एक नयी राह तलाशना है , और लिखना उसी की ओर जाती एक राह है।
संतान हो जाने पर लीडिया के लिए तलाक की बात सोचना भी संभव ना रहा और उसने महसूस किया कि मेरे पंख कतर दिए गए हैं ...। यूं अब दोनों के बीच का तनाव घटने लगा था, लिखने को लेकर उसका पति उसे तंग करना बंद कर चुका था फिर भी लीदिया को समझ नहीं आ रहा कि इस उदासी और उब की वजह क्‍या है, जबकि उसकी कहानियां छपने लगी थीं।
पहली मुलाकात के तीन साल बाद चेखव से लीदिया की दूसरी मुलाकात हुई तब वह तीन बच्‍चों की मां बन चुकी थी। एक गोष्‍ठी में वह चेखव का इंतजार करती सोच रही थी कि - क्‍या उन्‍हें मेरी याद होगी, कि उस अनुभूति को जिसने तीन बरस पहले मेरे भीतर उजाला भर दिया था हम फिर जी सकेंगे...। यहां मीर याद आते हैं, उम्र भर एक मुलाकात चली आती है...। चेखव भी उस मुलाकात को उसी तरह याद रखे थे - वे बोले - तीन साल पहले जब हम मिले थे तो क्‍या तुम्‍हें ऐसा नहीं लगा था कि हमारा परिचय पहली बार हुआ हो, मगर हमारी जान पहचान पुरानी है और हमने एक लम्‍बे बिछोह के बाद एक दूसरे को पाया है ... कि यह अनुभूति इकतरफा हो ही नहीं सकती...।
उस मुलाकात के समय के संवादों को देखा जाए तो वे आम प्रेमियों के संवादों की तरह थे , रोमान और उत्‍तेजना और एक निष्‍कपट बाल सुलभ जिज्ञासा से भरे हुए।

मेरे 'सुखी पारिवारिक जीवन' में अब कोई रोशन दिन नहीं होगा
चेखव और लीडिया पहली मुलाकात के तीन साल बाद जब मिलते हैं वे तो बडे मजाकिया लहजे में बातें करते हैं। वे सोचते हैं कि उनका संबंध जरूर पूर्वजन्‍म का है और शायद वे पिछले जन्‍म में प्रेमी हों और एक साथ डूबकर मरे हों। हंसी की इन बातों के बाद चेखव उलाहना देते हैं कि कितनी बुरी हो तुम , जाकर कुछ भेजा नहीं , मैंने तुमसे कहानियां मांगी थी ...। अभी उनकी बातचीत आरंभ ही हुयी थी कि चेखव को उनके प्रशंसक ले गये। यहां मजेदार यह है कि आज कल की तरह उस काल में रूस में भी लेखकों के साथ अफवाह उडाने वालों का एक तबका भिडा रहता था, सो उनमें किसी ने उडा दिया कि पार्टी में चेखव ने नशे में धुत्‍त होकर कहा कि वे लीडिया के पति से उसे तलाक दिला कर शादी करने वाले हैं। यह सब सुनकर लीडिया की समझ में कुछ आ नहीं रहा था कि वह क्‍या करे ...। अंत में चेखव से लीडिया की भेंट हुयी तो चेखव ने कहा कि मुझे लेकर दुनिया भर के ऐसे ही अफवाह हैं - कि , मेरी शादी एक अमीरजादी से हुयी है, कि अपने मित्रों की पत्नियों से मेरे संबंध हैं वगैरह वगैरह...।
फिर चेखव ने लीडिया से विदा ली तो उदासमना लीडिया ने सोचा - मेरे सुखी पारिवारिक जीवन में अब कोई रौशन दिन नहीं होगा ...।
इस मुलाकात के बाद चेखव के साथ उनका पत्राचार चलने लगा। लीडिया चोरी छुपे डाकघर जाकर चेखव के पत्र लाती । कभी कभार एकाध पत्र वह अपने पति मिखाइल को दिखा देती थी। इस पर उसके पति ने कहा कि मेरी दिलचस्‍पी इसमें नहीं कि चेखव तुम्‍हें क्‍या लिखते हैं अगर दिखा सको तो तुम यह दिखाओं कि अपने पत्र में तुम उन्‍हें क्‍या लिखती हो। पर लीडिया ने कभी अपने पत्र चेखव को नहीं दिखाए।
कुछ दिनों बाद चेखव फिर पीटर्सबर्ग आए तो लीडिया उनसे मिली। तब चेखव ने उससे उसके बच्‍चों के बारे में पूछ - तो लीडिया ने बहुत उत्‍साह से उन्‍हें इस बारे में बताया।
बातचीत में लीडिया ने चेखव को सलाह दे डाली कि अब आपको शादी कर लेनी चाहिए। तो चेखव ने कहा कि मुझे इसकी फुर्सत कहां है, फिर उन्‍होंने लीडिया से सवाल किया कि .... क्‍या तुम सुखी हो ...
लीडिया को अब जवाब नहीं सूझ रहा था - वह बोली - मेरे पति बहुत भले हैं और बच्‍चे भी। पर किसी का भला लगना और सुखी होना दोनों में अंतर है ना ...मुझे लगता है जैसे मैं घिर गयी हूं ... मेरा कोई अस्तित्‍व नहीं रहेगा। क्‍या इसी का नाम सुख है ..।
इस पर चेखव ने उत्‍तेजना में परिवार और स्‍त्री की पराधीनता की आलोचना करते कहा कि अपनी प्रतिभा को पहचानो।
फिर बात बदल कर चेखव ने कहा - अगर मैंने शादी की होती तो मैं अपनी पत्‍नी से अलग रहने के लिए कहता ... ताकि ज्‍यादा से ज्‍यादा समय साथ बिताने से आपसी व्‍यवहार में जो असावधानी या अशिष्‍टता का पुट आ जाता है, वह हमारे बीच न आ पाए।
घर पहुंचने पर उनके पति ने दरवाजा खोलते हुए कहा कि तुम्‍हारे बिना हम सब अनाथ हो जाते हैं ...।
अपने घर में पति के पास लेटी लीडिया सोच रही थी कि उसे चेखव से प्‍यार है ... ।
चेखव अक्‍सर उसे प्‍यारी बच्‍ची पुकारते-लीडिया चेखव- एक प्रेम कथा

अगली मुलाकात में चेखव ने लीडिया को उपन्‍यास लिखने की सलाह देते कहा - ... एक स्‍त्री को ठीक उसी प्रकार लिखना चाहिए जैसे कि वह कुछ काढती है। खूब लिखो और पूरे विस्‍तार में लिखो। लिखो और काटो। फिर लिखो - फिर काटो।
इस पर लीडिया ने कहा - यहां तक कि कुछ बाकी ही न बचे...
इस पर नाराज होते चेखव ने कहा - तुम बहुत खराब औरत हो ... जीवन जैसा है बस वैसा ही। लिखोगी न ...
तब लीडिया ने कहा - हां, लिखूंगी। ... मैं एक आजाने व्‍यक्ति की प्रेम कहानी लिखूंगी।...वह व्‍यक्ति जिसे आप जानते तक नहीं, आपको बहुत प्‍यारा हो गया है...क्‍या यह बेहद दिलचस्‍प नहीं है...
इस पर मजाक करते हुए चेखव बोलते हैं - जी नहीं। कतई दिलचस्‍प नहीं, प्‍यारी बच्‍ची।
यह संबोधन सुन लीडिया देर तक हंसती रही। चेखव अक्‍सर उसे प्‍यारी बच्‍ची पुकारते।
अंत में अगले दिन तक के लिए विदा होते चेखव ने उसे फिर उपन्‍यास लिखने की याद दिलाते कहा कि तुम लिखो कि कैसे तुम एक सैनिक अफसर के इश्‍क में कैद थीं।
फिर चेखव ने कहा कि तुम मुझ पर गुस्‍सा नहीं करोगी।...स्‍त्री को सदा स्‍नेहमयी और कोमल हृदय होना चाहिए।
अगली शाम चेखव लीडिया के घर खाने पर आमंत्रित थे। उसके पति कहीं बाहर गये थे। बच्‍चे चेखव से मिलकर सोने चले गए। हल्‍का खाते-पीते चेखव ने पहली बार अपने प्‍यार का इजहार करते कहा - क्‍या तुम्‍हें मालूम है ... इतना प्‍यार तो मैं दुनिया की किसी भी अन्‍य स्‍त्री से नहीं कर सकता ।... तुमसे बिछडना कितना दुश्‍वार होगा मेरे लिए। ... तुम्‍हें केवल पवित्र और निष्‍कलुष प्‍यार ही किया जा सकता है।...तुम्‍हें स्‍पर्श करते मैं डरता था,कहीं रूठ न जाओ ... यह कहते उन्‍होंने लीडिया का हाथ पकडा और तुरत छोड दिया ... उफ कितना ठंडा हाथ है ...


Udan Tashtari ने कहा…
आभार इस आलेख के लिए. बहुत रोचक!!

August 28, 2008 5:38 AM
Nitish Raj ने कहा…
...पर इन्हें समझना इतना आसान भी नहीं...पर पढ़कर अच्छा लगा।

1 comments:

pratibha said...

kamal hai bhai, bahut khoobsurat. aapka shukriya, is prem katha ko is tarah padhwane ka.