
वेदों की आधारभूमिस्पष्ट है कि खेतिहर समाज के लिए वर्षा प्राथमिक जरूरत है, इसी तरह बादलों से वर्षा कराने वाले इंद्र की पूजा भी स्वाभाविक है।
वेद आदिग्रंथ है। इसमें मांसाहारी समाज से विकसित हो, नए-नए बन रहे खेतिहर समाज के अनुभवों को ऋषियों ने अपनी ऋचाओं में अभिव्यक्त किया है। इन दोनों समाजों के बीच का टकराव वेद की आधारभूमि है। मांसाहार पर टिके पुराने मानुष समाज को नए खेतिहर समाज ने राक्षस की संज्ञा दी। खेतिहर समाज के ऋषि अहिंसा को अपनी ऋचाओं में प्राथमिकता देते दिखते हैं। इस विकास यात्रा में जो व्यक्ति या वस्तु उन्हें सहायक दिखते हैं। वे उसे देवता मान पूजा करते हैं। इन देवताओं में अग्नि-इंद्र से लेकर सोम, ओदन (भात) और मधु आदि सैकड़ों चीजें शामिल हैं। इन वेदों में आपको पूजा-प्रेम-घृणा-क्रूरता सभी भावों की अभिव्यक्तियां दिखती है।
चारों वेदों में ऋग्वेद को पहला और महत्वपूर्ण माना गया है। ऋग्वेद का आरम्भ मधुच्छन्दा ऋषि के अग्निदेव की अभ्यर्थना में लिखे गए श्लोकों से होती है। अग्नि को ही आरम्भ के लिए क्यों चुना गया इसका कारण इस श्लोक से हम समझ सकते हैं। इस ऋचा के अन्तिम श्लोक में लिखा गया है-हे अग्नि! पिता जैसे पुत्र के पास स्वयं ही पहुंच जाता है। वैसे ही तू हमको सुगमता से प्राप्त हो जाती है।
मतलब, विकास के क्रम में खेतिहर समाज को जो चीजें सहज उपलब्ध होती गईं और लाभकारी बनीं उन्हें देव पुकारा गयाअग्नि की विकास क्रम में महत्वपूर्ण जगह है। अग्नि की खोज ने खेतिहर समाज को मांसाहारी समाजों से आगे कर दिया। फिर यह अग्नि धीरे-धीरे सहज उपलब्ध होने लगी इसलिए इसकी अभ्यर्थना से ही ऋग्वेद का आरम्भ किया गया। वेदों में राक्षसों को अग्नि से डरने वाला बताया गया है। इससे भी जाहिर है कि अग्नि से राक्षसों का परिचय ठीक से नहीं था। विकास की कड़ी में वे पिछड़े रहे थे और खेतिहर समाज के कामों में भयवश अवरोध उत्पन्न करते थे।
अग्नि से भी ज्यादा वेदों में इन्द्र देवता की पूजा की गई है। इन्द्र को वर्षा का देवता कहा गया है। यहां भी स्पष्ट है कि खेतिहर समाज के लिए वर्षा प्राथमिक जरूरत है। इस तरह बादलों से वर्षा कराने वाले इन्द्र की समर्थक पूजा भी स्वाभाविक है। अधिकांश श्लोकों में इन्द्र से धन-धान्य-गौ की मांग की गई है। उस काल में गौ खेतिहरों के लिए मुख्य धन या गौ की ज्यादा संख्या से धनी होने का सम्बन्ध था। वर्षा से जहां फसलें होती थी, वहीं गाय को पर्याप्त चारा भी मिलता था। इसलिए इन्द्र से गौ की रक्षा की मांग की जाती थी। गौ से ही खेती के लिए बैल भी प्राप्त होते थे। इसलिए मांसाहारी समाजों से संघर्ष में गौरक्षा मुख्य विषय था। इसी सन्दर्भ में इन्द्र द्वारा वृत्रासुर-वध का प्रसंग आता है। वृत्र को राक्षस पुकारा गया है। जो जल को रोके हुए था। दरअसल वृत्र के मानी वहां बादल से भी है। जिसे तडित कराकर (बिजली गिराकर या वज्र गिराकर) इन्द्र बारिश कराते हैं। यूं आगे वृत्र ब्राह्मण भी कहा गया है, क्योंकि उसकी हत्या के बाद ब्रह्महत्या के भय से इन्द्र तालाब में छिप जाते हैं।
वैदिक काल में यज्ञ एक महत्वपूर्ण क्रिया-कलाप था। अधिकांश ऋचाओं में ऋषि देवों को अपना यज्ञ सफल बनाने के लिए आहवान करते दिखते हैं। यज्ञ भी खेतिहर समाज के लिए उस समय एक जरूरी क्रिया थी। खेतिहर समाज को खेती के लिए लगातार जमीन की जरूरत पड़ती थी, चूंकि उस समय चारों ओर जंगल थे, तो उसके लिए वनों काटना और जलाना पड़ता था। इससे नई जमीन हासिल होती थी। यही काम आगे यज्ञ के रूप में मान्य हो गई। यज्ञ में हवन के रूप में जंगल में लाई लकिड़यां जलती थी। उससे उठे धुएं से बारिश होती थी, जो खेतिहर समाज के लिए जरूरी था। यज्ञों को लेकर भी मांसाहारी पूर्वजों से खेतिहर समाज के लोगों का युद्ध होता था। चूंकि यज्ञ के नाम पर वनों के विनाश से उनकी आखेट भूमि नष्ट होती थी। इसीलिए वे यज्ञों को नष्ट करते थे। और राक्षस की संज्ञा पाते थे। वेदों में इस दृष्टिकोण से भी कुछ नया खोजने की जरूरत है।
ब्रह्म (अन्न) सत्यं, जगत मिथ्या ... परस्पर सद्भावना, जीव मात्रा के प्रति प्रेम, सहिष्णुता आदि भारतीय लोकमानस के जो सकारात्मक पहलू हैं। उनकी जड़ें, वेदों में ही हैं। वेदों में धर्म और भाषा के विभेद नहीं है। अथर्ववेद के बारहवें कांड के पहले सूक्त में एक पंक्ति है : जनं बिभ्रती बहुध विवाचसं नानाधर्माणां पृथिवी यथौकसम। इसका अर्थ यह है कि अनेक धर्म और भाषा वाले मनुष्यों को पृथ्वी समान रूप से धारण करती है। यह जो वेदों की सहज समतामूलक दृष्टि है, उसे हम उदारता के रूप में व्याख्यायित करते हैं। पर सच्चाई यह है कि उदारता का दयाभाव इन पंक्तियों का आशय नहीं है, बल्कि यह एक सहजबोध है। एक सामाजिक अनुभव। क्योंकि उस समय धर्म का मतलब धर्मराज्य कायम करने से नहीं जुड़ा था, बल्कि धर्म तब आचरण और व्यवहार से जुड़ा था।
वेद ही नहीं ब्राह्मणग्रंथ, अरण्यक, उपनिषद् आदि में भी हमें तत्कालीन लोगों के सहज अनुभव ही प्राप्त होते हैं। गड़बड़ी तब होती है, जब हम उनकी पंक्तियों के अर्थ सन्दर्भ से काटकर प्रस्तुत करते हैं या उन्हें क्रमश: रूढ़ियों की तरह आज भी लागू करना चाहते हैं।
एक चितरंजन सवाल है कि सत्य क्या है। क्या वह चितरंजन भी होता है। तैत्तिरीय ब्राह्मण में सत्य के बारे में लिखा है। चक्षुर्वे सत्यम्, मतलब जो दिख रहा है, वही सत्य है। शतपथ ब्राह्मण में सत्य को देव और ब्रह्म कहा गया है। इसी में आगे कहा गया है कि अभय ही स्वर्ग है। अब यहा¡ सवाल उठता है कि अभय क्या हुआ? दरअसल अभय का सम्बन्ध दृष्टि से है। सत्य को देखनेवाली दृष्टि। यह दृष्टि विकसित हो जाने पर जब आप सत्य को उसके बहुआयामी स्वरूप में समझने लगते हैं तो जीवन को लेकर आपकी आशंकाए¡ कम होती हैं और आप निर्भय होते जाते हैं।
उपरोक्त सन्दर्भ में देखें तो किसी रहस्य के लिए कहा¡ जगह बचती है। बातें इतनी साफ हैं वहा¡ कि हमें किसी स्वामी या बापू की जरूरत नहीं है। इन्हें समझने के लिए अथर्ववेद में लिखा है : गातु वित्वा गातुमित। यानी मार्ग को जानो फिर चलो। यह नहीं है कहीं कि सत्य का दृष्टा मैं हू¡, पैगम्बर या मसीहा और आप सब मेरी राह पर चलें। अथर्ववेद में ही आठवें कांड के पहले सूक्त में कहा गया है कि पितरों की राह पर न चल (मानुगा: पितृन)। तो, लीक लीक गाड़ी चले, लीके चले कपूत, जैसे लोक में प्रचलित मुहावरों की जड़ें भी हम वेदों में पाते हैं। वेदों में हर जगह मन की, बुद्धि की ही महत्ता है। अपनी बुिद्ध को जो सही लगे उसी राह चलने की बात वहा¡ है। यजुर्वेद में है कि यह बुिद्ध ही सर्वोपरि है (इयमुपरि भति:) यही विश्वकर्ता है। एक जगह लिखा है कि मन रूपी गंधर्व ही प्रजापति और विश्वकर्मा है। आगे है कि प्रजापति (मन) ने असत्य में अश्रद्धा और सत्य में श्रद्धा को स्थापित किया।
अगर उपनिषदों को देखें तो वहा¡ और भी आगे की बातें हैं। इशावास्योपनिषद् में एक जगह कहा गया है, निरे भौतिकवादी अंधकार में जा पहुंचते हैं। अब हमारे बापू नाम केवलम् वाले यह पंक्ति पढ़कर लेगेंगे भौतिकवादियों को समझाने की देखो कैसी गर्हित बातें हैं परम्परा में, भौतिकवादियों के लिए। पर इसी श्लोक की अगली पंक्ति में लिखा है, निरे अधयात्मवादी उससे भी गहरे अंधकार में जा पहु¡चते हैं।
यहा¡ सवाल उठता है कि तब क्या किया जाए? भौतिकवाद, न अधयात्मवाद। तो फिर! यहा¡ निषेध नहीं है, बल्कि कहा गया है किोई भी वाद हो उसे आंख मूंदकर ना स्वीकारें जीवन के द्वंद्व को समझें। और अपने समय सन्दर्भ में उसकी व्याख्या करें।
अगर धयान से देखा जाए तो हमारे पुराग्रंथों में भौतिकवाद को कहीं भी अध्यात्म से कम नहीं आंका गया है। सामवेद में एक ऋचा में अन्न को ब्रह्म से भी पहले जन्मा बताया गया है। अरण्यक में लिखा गया है कि अन्न ही ब्रह्म है। अरण्यक के इसी अèयाय में आगे कहा गया है कि तप (कर्म) से ही ब्रह्म (अन्न) को पाया जा सकता है। अरण्यक के आठवें अध्याय की दूसरी कंडिका में कुछ पंक्तियां यूं हैं :
अन्नं ही भूतानां ज्येष्ठ्म तस्मात् सर्वेषध मुच्यते।
अन्नाद् भूतानि जायन्ते, जातान्येन्नेन वधनते।
मतलब जीवन-जगत् में अन्न ही श्रेष्ठ है। वह सभी रोगों की औषध है। अन्न से ही प्राणी पैदा होते हैं और अन्न से ही बढ़ते हैं। ऐतरेय ब्राह्मण में तो अन्न को विराट भी बताया गया है। (अन्नं वै विराट) उपरोक्त तथ्यों के प्रकाश में अगर अब हम कहें कि ब्रह्म (अन्न) सत्यं, जगत मिथ्या तो क्या अनर्थ होगा।
साधो, मन माने की बात मन एवं मनुष्याणां मन यानी कि मानस ही मनुष्य है, एक प्रचलित उक्ति है। वेद भी मन की महत्ता से भरे हैं। आज भी मन की शक्ति से खुद को मुक्त नहीं कर पा रहा है कोई। सारे संयम मन से ही संचालित होते हैं। कबीर ने भी लिखा था : मन ना रंगाये रंगाये जोगी कपड़ा। पिछले वर्षों में भारत में ऐसे जोगियों की धूम मची रही। वेद-परम्परा आदि के नाम पर एड़ी-चोटी का पसीना एक करते रहे।
काश! उन्होंने वेदों को पढ़ने की जहमत उठाई होती तो उनहें एक-दूसरे के खून से अपने हाथ न रंगने पड़ते। मानो तो देव नहीं तो पत्थर यह लोकोक्ति वैदिक ही है। क्योंकि वहा¡ भी यही लचीलापन है। जिसके मन को जो भा रहा है, वही बात कर रहा है, कह रहा है। वहां कोई नियम नहीं है, मन को बांधने वाला।
यजुर्वेद में मन के बारे में ऋचा है : इयमुपरि मति:, मतलब यह जो मानस से उपजी बुिद्ध है। वही सर्वोपरि है। आगे की ऋचाओं में उसे विश्वकर्मा भी बताया गया है। प्रजापति विश्वकर्मा मनो गंèार्व: यानी मन रूपी गंधर्व ही प्रजापति ब्रह्म और विश्वकर्मा है।
दरअसल वेद के सारे कथन `मनमाने´ की बात हैं। वे प्रमाण हैं कि कैसे मानव मन का निरन्तर परिष्कार होता गया। उन्होंने वही लिखा, जो उनके मन को भाया। ऋग्वेद के पांचवें मंडल के सत्तरवें सूक्त में एक पंक्ति है-वय ते रुद्रा स्यामा। यानी हम भी दु:खहारी रुद्र हों। वहीं पहले मंडल के 164वें सूक्त में एक पंक्ति में इसी तरह कहा गया है कि हम सब भगवान हों।
माने आदमी-देवता और भगवान में कोई विशेष अन्तर नहीं था। वैदिक माल में वैदिक ऋषि देवता होने की कामना करते थे, देवता होते थे और जो उनके मन को भाता था उसे देवता पुकारते थे। यह सब मनोभाव के स्तर पर था, उसकी कोई मूर्ति नहीं थी। यजुर्वेद के बत्तीसवें सूक्त में एक पंक्ति है : न तस्य प्रतिमा ·अस्ति। यानी उस परमचैतन्य की मूर्ति नहीं बनाई जा सकती। ऐसा इसलिए था कि ईश्वर या देव एक मनोभाव था। अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग काल में उसके जुदा निहितार्थ थे।
देखा जाए तो वैदिक काल में मनुष्यों का मन भी तरह-तरह की कल्पनाएं करता है। जब वह सुबह को देखता है तो उल्ल्सित हो उठता है। और उषा की अर्चणा में ऋचाएं रचता है। रात से वह भी भय खाता है और उसे सर्वग्रासी बताता है। सोमपान के बाद उसका मन भी प्रमत्त हो जाता है और वह असंभव कल्पनाएं करने लगता है। जरा ऋग्वेद के दसवें मंडल के 119वें सूक्त की पंक्तियों के अर्थ देखें। उसमें कहा गया है : ``मैं पृथ्वी को जहां चाहूं उठाकर रख सकता हूं, क्योंकि मैं अनेक बार सोमपान कर चुका हूं।´´ या ``मेरा एक पक्ष स्वर्ग में स्थापित है तो दूसरा पृथ्वी पर। क्योंकि मैं अनेक बाद सोमपान कर चुका हूं।´´
मनोभावों को स्वच्छन्द ढंग से अभिव्यक्त करने की यह प्रवृत्ति मात्रा पुरुषों में ही नहीं है। स्त्रियां इसमें और भी आगे है। ऋग्वेद के अन्तिम मंडल के 159वें सूक्त में पंक्ति है-अहं के तुरहं मूर्धा इहा मुग्रा विवाचुनी। यानी मैं (गृहपत्नी) घर की, परिवार की ध्वजा हूं। मस्तक हूं।
वेद चर्चा - असुर नहीं, पूर्व देव परम्परा में असुर देवता और असुर दोनों के पूर्वज हैं। उन्हें इसलिए पूर्वदेवा: भी पुकारा जाता है, संस्कृत में, असुर शब्द तो आधुनिक देवों के पूर्वदेवों (असुरों) से संघर्ष के बाद उनके लिए घृणा को प्रकट करने के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा। सभ्यताओं के संघर्ष में हमेशा आधुनिक ही जीतते हैं और वे अपने हारे हुए शत्रुओं को सभ्य ढंग से क्यों पुकारेंगे। अर्थववेद के पृथ्वीसूक्त में एक पंक्ति है : असुरानभ्यवर्तयन्। इसका अर्थ है-जिस पृथ्वी पर पुराने लोगों ने कई प्रकार के कार्य किए और जिस पर देवताओं ने `असुरों´ पर आक्रमण किए । ये पुराने लोग वे पूर्वदेव ही थे।
कुछ लोग परम्परा के नाम पर खुद को वेदों तक सीमित रखते हैं वे पूर्वदवों की कृतियों को भूल जाते हैं। जबकि जानकर वेदों के पूर्व के साहित्य को भी उतना ही महत्व देते हैं। पौराणिक हिन्दू धर्म के पहले से निगमागम नाम प्रसिद्ध है। निगम का माने वेद हुआ और आगम का मतलब प्राग्वैदिक वैदिकेतर परम्परा है। तुलसी दास ने भी निगमागम धर्म सम्मतं कहा है।
पूर्वदेवों को `अयज्ञा:´ `अनिंद्रा´ आदि भी पुकारा जाता था। अयज्ञा यानी यज्ञ प्रथा को न मानने वाले और अनिंद्रा मतलब इन्द्र को न माननेवाले। यज्ञ को मानने वाले उन्हें दास और दस्यु भी पुकारते थे। प्राग्वैदिकों के और भी कई नाम थे, जैसे-विद्याधर, नाग, यक्ष, राक्षस आदि।
यह कितनी मजेदार बात है कि असुर देवों के पूर्वज ही नहीं थे, वाकई उन्होंने देवों से पहले बहुत-सी अच्छी चीजें रची थीं। वहां सबकुछ बुरा नहीं था जैसा कि देवों ने उन्हें आगे साबित करने की कोशिश की। संभवत: वे सभ्य भी थे। भवन निर्माण की कला भी वे जानते थे। इन्द्र का एक नाम पुरंदर यानी पुरों (नगरों) को नष्ट करने वाला भी है। महाभारत में भी एक जगह मय असुर का जिक्र है जिसने पांडवों के लिए भवन निर्माण किया था।
दरअसल इस बारे में कुछ भी साफ-साफ नहीं कहा जा सकता। यह भी हो सकता है कि देवों ने दस्युओं को पराजित कर दास बना लिया उनसे तरह-तरह के काम कराया गया और स्वभावत: वे निपुण हो गए। यूं भी सारे कर्मकार और शिल्पकार तथाकथित सवर्ण जातियों के घेरे के बाहर पड़ते हैं। देखा जाए तो तथाकथित सारी सभ्यताओं का निर्माण दासों के शोषण से हुआ है।
अध्यात्म, दर्शन, ब्रह्मचर्य, आश्रम आदि की स्थापना भी देवों ने नहीं असुरों ने की थी। प्रह्लाद भी असुर थे उनके पुत्र कपिल ऋषि ने ही ये स्थापनाएं की थीं। यूं देव और असुर का बहुत साफ बंटवारा भी नहीं है। वैदिक देवों में एक देवता असुर भी है। फिर ऋषियों में एक कुत्स ऋषि हैं, यह शब्द कुत्सा से जुड़ा है।
ऋषि में सारी अच्छाइया¡ ही नहीं होती थीं। इस माने में ऋषि शब्द मुनि से बहुत दूर पड़ता है। जबकि हम दोनों का एक साथ उच्चारण करते हैं। ऋषि-मुनि। ऋषि वैदिक शब्द है। जबकि मुनि बौद्ध और जैन धर्म से जुड़ता है। ऋषि जहां मूलत: मांसाहारी हैं, वहीं मुनि अहिंसक। ऋषि वेद सुननेवाले शूद्र को कान में गर्म रांगा भरने की बात करते हैं। जबकि मुनि दलितों के हितैषी और बौद्ध-जैसे सन्त सम्प्रदायों के जन्मदाता। मुनि मूलत: प्राग्वैदिक (वेदों के पूर्व से) हैं।
परम्परा में शिवत्व की जो भावना है उसका भी श्रोत वैदिकेत्तर (वेद से पूर्व) है। वेदों में शिव की नहीं रुद्र की चर्चा है। वहां रुद्र अन्तरिक्ष के विनाशकारी देवता हैं। जबकि शिव का सम्बन्ध पूर्वदेवों से है। असुर गण (भूत-प्रेत-पिशाच) उनके सहज मित्र हैं। यक्ष और राक्षस भी उन्हें प्रिय हैं। अपने असुर गणों की सहायता से ही उन्होंने यक्ष प्रजापति का वैदिक यज्ञ विध्वंस किया था।
इसी तरह हनुमान, भैरव, शक्ति, गणेश आदि का सम्बन्ध भी शिव से है। वेदों में इनका स्थान नहीं है। कहीं जिक्र है भी तो गौण रूप में। वेदों में ग्राम है, पर नगर नहीं। वहीं पुराणों में नगर निर्माता असुर मय दानव की चर्चा है।
वेद शब्द का सम्बंध विद्या से है। विद्या जानने वालों से है। वेद चार ही हैं आज। यूं वेदत्रयी भी पुकारा जाता है। इसमें अथर्ववेद को छांट दिया जाता है। इसी तरह पहले धनुर्वेद, आयुर्वेद, गंधर्ववेद, सर्पवेद, पिशाचवेद, असुरवेद, आदि भी थे। जिन्हें बाद में भुला दिया गया है। देखा जाए तो असल में कर्मवेद वही थे, जबकि वेदत्रयी तो एक तरह से मनोवेद हैं। इसकी बातें भावनापरक और आकाशी ज्यादा हैं। जबकि बाकी वेद (विद्याएं) जीवन-जगत के ज्यादा काम की थीं। बाकी विद्याएं प्राग्वैदिक काल से ही चली आ रही थीं। प्राग्वैदिक देवों के अलग-अलग कामों से जुड़े उनके नाम थे, उनमें विविधता थी। जबकि वैदिक काल में एक मात्र मन की महत्ता को ही विविध रूप दे दिया गया। यजुर्वेद में एक श्लोक है, सूक्त 32 में-उसका अर्थ है कि अग्नि, वायु, आदित्य, प्रजापति, आदि एक ही देवता हैं। वे एक ही मूलतत्व की विभूतियां हैं।
स्त्रियों ने भी रची हैं वैदिक ऋचाएं वेदों के पुनरपाठ की इस कड़ी में आप देखेंगे कि जिस स्त्री के वेद पढ़ने पर ही प्रतिबंध था, उसके कई हिस्सों की रचयिता वे खुद हैं।
वेदों को लेकर सबसे बड़ा वितंडा यह है कि यह अपौरुषेय है, ब्रह्मा की लकीर है, वेदों का अध्ययन करने पर यह भ्रम सबसे पहले दूर होता है। वेद की हर ऋचा को रचनेवाले ऋषि का नाम उसमें दर्ज है और ऋषि एक-दो नहीं पच्चीसों हैं, जिनमें दर्जनों नारियां है। अब कोई एक लेखक हो तो उसका नाम लिखा जाए वेद के लेखक के रूप में, बहुत सारे लेखक होने के कारण ही सबका नाम उनकी रचना के साथ दे दिया गया है।
वेद ब्रह्मा की लकीर भी नहीं हैं, इस बारे में तो हमारे पुराने शास्त्रों में ही कई कथन मिल जाएंगे। परशर-माध्वीय में कहा गया है-
श्रुतिश्च शौचमाचार: प्रतिकालं विमिध्यते।
नानाधर्मा: प्रावर्तन्ते मानवानां युगे युगे।।
मतलब, हर युग में मनुष्यों की श्रुति (वेद), आचार, धर्म आदि बदलते रहते हैं। अब सवाल उठेगा कि वेदों की तब क्या प्रासंगिकता है। जवाब में हम सिर ऊंचा कर कह सकते हैं कि वेद हमारे आदि पुरुषों-स्त्रियों के प्रथमानुभूत सुन्दर विचार हैं, पर वे अन्तिम विचार नहीं हैं। दरअसल, वेद उस समय की उपज हैं, जब विकास क्रम में लगातार नई-नई चीजों की खोज हो रही थी।
उनमें जो भी चीजें थीं, जो हमें कुछ देती थीं, वे आगे देवता कहलाने लगीं। ऐसा नहीं था कि केवल लाभदायक चीजें ही देवता कहलाईं। जो भय त्रास देती थीं, वे भी देवता कहलाई, जरा अपने कुछ प्रचलित वैदिक देवताओं के नाम देखें-जंगल, असुर, पशु, अप्सरा, बाघ, बैल, गर्भ, खांसी, योनि, पत्थर, दु:स्वप्न, यक्ष्मा (टीवी), हिरण, भात, पीपल आदि।
अब कुछ अप्रचलित ऋषियों के नाम देखें जिन्होंने वैदिक ऋचाए रचीं-मानव, राम, नर, कुत्स, सुतम्भरा, अपाला, सूर्या सावित्री, श्रद्धा कामायनी, यमी, शची पौलमी, ऊर्वशी आदि। वेदों की रचना में स्त्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका है, यह उपरोक्त स्त्री ऋषियों की ऋचाओं को पढ़कर जाना जा सकता है।
मजेदार बात यह है कि स्त्री ऋषियों ने कई ऐसी ऋचाएं रची हैं जिनमें उन्होंने खुद को ही सर्वशक्तिमान कहा है।
कहीं यह स्त्रियों की मजबूत स्थिति ही तो नहीं है कि आगे षड्यंत्रकारी पुरुष वैदिक भाष्यकारों ने उनको वेद पढ़ने की ही मनाही कर दी, जिसकी आज तक वकालत की जाती है। जो स्त्रियां¡ खुद वेद रच सकती हैं, उन्हें उनका पाठ करने से कोई कैसे रोक सकता है? वेद को पढ़ें, तो वे अपने समय की सहज रचना मालूम पड़ती हैं। बातें वहां बड़ी सीधी हैं। उनको समझने के लिए किसी प्रकाण्डता की जरूरत नहीं है, जरूरत उनकी अनुवाद के साथ उपलब्धता की है।
वेदों में प्रकृति को लेकर सहज उल्लास है, प्रकृति आज भी हमें उसी तरह उल्ल्सित करती है। वहां छोटी-छोटी कामनाओं के लिए आदमी इन्द्र से याचना करता है। आज तक वह याचक कृति हमारे लिए अभिशाप बनी चली आ रही है। छोटे-छोटे डरों से भयाक्रान्त वैदिक मनुष्य ऋचाओं में उन्हें देवता पुकारता, उनसे मुक्ति की मांग करता है।
वह विकास का आरिम्भक दौर था और जानने की प्रक्रिया में यह एक सहज क्रिया थी, विशिष्ट नहीं। जैसे ऋग्वेद के दसवें खंड के 184 वें सूक्त में ऋषि त्वष्टा लिंगोक्ता : देव से प्रार्थना करते हैं-विष्णुयोनि कल्पयतु, त्वष्टा रुपाणि पिंशतु। मतलब, देवता इस स्त्री को प्रजनन योग्य बनावें। आज इस काम के लिए लोग डॉक्टर के पास जाते हैं।
क्या उन्हें आज भी किसी ऋषि की खोज करनी चाहिए? इसी तरह सूक्त 165 में कहा गया है, `इस अमंगलकारी कबूतर को हम पूजते हैं। हे विश्वदेव, इसे यहां से दूर करें।´ क्या आज भी हमें कबूतर को अशुभ मान उनसे डरना चाहिए। आज कबूतर हमारे मिन्दरों में छाए रहते हैं और कोई उन्हें अशुभ नहीं मानता है। मतलब वेदों में सारा अटल ब्रह्मवाक्य ही नहीं है।
सबसे बड़े वैदिक देवता भात ( ओदनम् ) वृहस्पति मस्तक है भात का
अश्व इसके कण हैं
गायें हैं चावल के दाने
और मच्छर हैं फोंतरे
घोंघे हैं इसके उूपर के छिलके
बादल इसका चारा है
काला लोहा है इसका मांस
और रूधिक है तांबा
जस्ता इसकी राख
हरित है इसका रंग
और नीलकमल है
इसकी गंध
यह धरती मिटटी का वर्तन है
इसमें पकता है भात
आकाश ढक्कन होता है
हल की फाल पसलियां हैं इसकी
मिटटी है इसका मल
ऋतुएं रसोइनें हैं इसकी
दिन और रात समिधाएं हैं
पांच मुख वाले चरू को
पका रहा घाम
इस भात को अर्पित कर
जो कर रहा है यज्ञ
सारे लोक
उसे प्राप्त होते हैं।
( वरिष्ठ कवि विजेन्द्र के संपादन में निकल रही लघु पत्रिका
कृति ओर के जुलाई-सितंबर 2007 अंक में राधावल्लभ त्रिपाठी द्वारा अनुदित
अर्थववेद से लिया गया अंश )
वेदों में क्या है
वेद देव स्तुति से भरे हैं। देवता माने जो देता है। सुर जो सुरा का सेवन करते हैं असुर जो नहीं करते। वेदों में सर्वाधिक प्रार्थना इंद्र की हुई है। पर इसका मतलब यह नहीं कि इंद्र सबसे महत्वपूर्ण देवता हैं। इंद्र के बाद सबसे ज्यादा मंत्र अग्नि पर है। ऋग्वेद का आरंभ अग्नि पर लिखी ऋचा से होता है। यह सम्मान इंद्र को नहीं मिला है। दरअसल किस पर कितनी ऋचा है इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उसमें क्या लिखा है। इंद्र पर लिखी गईं अधिकांश ऋचाएं धन-धान्य के लोभ में लिखी गई हैं। यजुर्वेद के तीसरे अध्याय में लिखा गया है कि हे सैकडों कर्मो वाले इंद्र , हमारे और तुम्हारे मध्य परस्पर क्रय-विक्रय जैसा व्यवहार संपन्न हो। अर्थात मुझे हर्विअन्न का फल मिलता रहे। हे इंद्र मूल्य लेकर क्रय योग्य फल मुझे दो। फिर उन ऋचाओं में इंद्र को सर्वश्रेष्ठ भी नहीं बताया गया है। अथर्ववेद में भात यानि चावल को देव मानकर कई ऋचाएं हैं। उनमें भात को जो सम्मान मिला है वह इंद्र के लिए लिखी गई सैकडों ऋचाओं में नहीं है।
भात को न केवल त्रिदेवों का कारक बताया गया है बल्कि उसे काल का भी जन्मदाता माना गया है। इसी तरह उच्छिष्ट यानि जूठन-मधु की प्रशंसा में जो लिखा गया है उनमें भी मधु की इंद्र से अच्छी स्तुति है। इसी तरह रूद्र को भी जो महत्व दिया गया है यजुर्वेद में वह इंद्र से कम नहीं है। एक श्लोक में लिखा गया है- हे रूद्र आपके नेत्रों में तीनों लोक प्रकाशित हैं। आपको अन्य देवताओं से अलग और उत्कृष्ट जानकर हम आपको यज्ञ का भाग देते हैं। रूद्र को चिकित्सक के रूप में महत्व देते हुए कहा गया है कि - तुम सर्वरोगनाशक औषधि प्रदान करो और हमें जन्म-मरण के चक्र से मुक्त करो।
ऐसा नहीं था कि वैदिक ऋषि केवल देवों और त्रिदेवों को ही पूजते थे। वे भात, मधु, पत्थर, आदि के साथ यजमान को भी पूजते थे। अपनी प्रशस्ति गाने में भी वे पीछे नहीं रहते थे। बहुत से ऋषियों ने खुद पर ही ऋचाएं लिखी हैं। जैसे अथर्व वेद में अथर्वा खुद की अभ्यर्थना करते हुए अपने को देवताओं से भी बडा दिखाते हैं।
यजुर्वेद के तीसरे श्लोक में यजमान के लिए ऋषि लिखते हैं- हे यजमान, यश के निमित्त अन्न और अपरिमित धन व बल पाने के लिए मैं तुझे पूजता हूं। इस तरह वेद देवों-मनुष्यों-ऋषियों के भौतिकवादी व्यवहार को ज्यादा उजागर करते हैं आध्यात्कि व्यवहार को कम।
टिप्पणियां- deepanjali ने कहा…
आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा.
ऎसेही लिखेते रहिये.
क्यों न आप अपना ब्लोग ब्लोगअड्डा में शामिल कर के अपने विचार ऒंर लोगों तक पहुंचाते.
जो हमे अच्छा लगे.
वो सबको पता चले.
ऎसा छोटासा प्रयास है.
हमारे इस प्रयास में.
आप भी शामिल हो जाइयॆ.
एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.
September 25, 2007 1:48 AM
अतुल ने कहा…
वेदों और उपनिषदों में स्त्रियों की बडी भूमिका रही है, जिसपर ब्राह्मण और पुराण काल से रोक लगने लगी, जब देश में बड़े-बडे सामंती चरित्र के साम्राज्य स्थापित होने लगे.
April 14, 2008 8:07 AM
देव प्रकाश चौधरी ने कहा…
रोचक लेख....जानकारी काम की है। शुक्रिया
April 14, 2008 8:09 AM
विजयशंकर चतुर्वेदी ने कहा…
आप अच्छा लिख रहे हैं. कृपया जारी रखें!
May 19, 2008 5:42 AM
अतुल ने कहा…
फ़ारसी में अहुर देव ही हैं. वेद में भी थे पर बाद में सुर के विरोधी माने जाने लगे. अवेस्ता में भी चर्चा है.
April 15, 2008 9:05 AM
Udan Tashtari ने कहा…
आभार इस आलेख के लिए.
August 13, 2008 7:36 AM
अभय तिवारी ने कहा…
पूरा लेख बेहतरीन बन पड़ा है..सिवाय एक बात के.. आप ने देवता माने देने वाला बताया है.. जबकि देवता की उत्पत्ति द्युत धातु से है.. द्युत माने चमकना.. इस द्युत से ही द्युति, द्यूत, दिवस, दिव्य, देव , देवता, द्योतक आदि शब्द बने हैं.. तो देवता का अर्थ चमकने वाली शक्ति के अर्थ में बनेगा..
आशा है आप अन्यथा न लेंगे और अपना अमूल्य काम निर्बाध जारी रखेंगे..
August 16, 2008 6:40 AM
हकीम जी ने कहा…
Veda is a body of religious and philosophical beliefs and cultural practices native to India and based on a caste system; casteism is not poisonous, its the most wonderful social ordering of people based on their individual skills (work)
Discrimination based on the work u do, is the inhuman and poisonous thing..
Even today people all over the world discriminate others based on the work they do, their earnings, their type of life, money, their knowledge, their religion, their race, their skin color etc., and what no...
more progressed humans(in some way) have always been discriminating less progressed humans, this should stop through out the world, you cannot blame india, hindus and casteism for this.
It is false to say caste and skin color are related, they are darker brahmins and there are whiter lower caste people..
In ancient India...In every village there used to be atleast one family belonging to each of the caste(means people belonging to working groups like merchants, teachers, labourers, leader), and only if each mingle with each other.. and work for each other...every one in the village will be happy..
So in every function(ie either temple, marriage or any social function)every caste(family) in the village used to take part...
and every caste used to contribute to the function....
it was a custom that every caste profit from that function and grow.(for eg in marriage-the brahmins do the mantra part, the vaisyas take care of all the business & agri part of the function, the sudras, does the shaving, haricut and other help for smooth functioning of the marriage,kshtriya takes care and looks to that no untoward incident happens in the function )
it is because people started discriminating people based on the work they do and failed to do their duty that india such a rich country once, is now in this condition.
Brahmins failed to do their teaching and spiritual duty, thats why the lack of sprituality in people, no one knows what vedas and gita is..and some western religion is converting people and explaining spirituality to a highly spiritual india.
Vaisyas failed to do their duty that why the economy went down..
the kshatriyas did not do their duty thats why islamic, protugese and british people from west invaded us and looted all treasures (both intellectual and material) what we had.
All now in india are sudras, working in front of computers for some alien country or doing jobs for others..i'm happy to be a sudra and work for others, but all other caste have not done their duty and thats why india is alien for indians them selves...
you can see intercaste marriages in mahabharatha ramayana etc.,
its false to say that no one was allowed to inter marry