Saturday, January 24, 2009

चेतन भगत - बेस्‍टसेलर बनाने के नुस्‍खे


थ्री मिस्टेक्स ऑफ माय लाइफ युवा भारतीय लेखक चेतन भगत का तीसरा बेस्टसेलर अंग्रेजी उपन्यास है। यह उपन्यास भारतीय युवा वर्ग की वर्तमान मन: स्थितियों को बारीकी से प्रस्तुत करता है। उपन्यास के केन्द्र में व्यवसाय प्रधान राज्य गुजरात का एक व्यवसायोन्मुख युवक गोविन्द है। आत्महत्या की कोशिशों के बाद बच जाने वाला यह युवक चेतन भगत को अपनी त्रासद कथा सुनाता है, जिसमें तीन घटनाओं में अपनी भागीदारी को वह तीन गलतियों के रूप में चिन्हित करता है। पहली गलती के रूप में धीरे-धीरे जम रहे व्यवसाय को ऊँचे मकाम पर ले जाने के लिए लगाई गई छलाँग को रेखांकित किया जाता है? तो दूसरी गलती के रूप में युवा प्रेमियों में सेक्स के लिए बेताबी के रूप में युवा प्रेमियों में सेक्स के लिए बेताबी से पैदा मुश्किलातों को देखा गया है तीसरी गलती में समय पर एक जरूरी फैसला ना ले पाने से हुई जीवन की हानि को दिखाया जाता है।
युवा मनोविज्ञान की अच्छी समझ है चेतन को, जो संवादों में अपनी बारीकी के साथ अभिव्यक्त होता है। 21वीं सदी का निम्न मध्यवर्गीय युवा किन कठिनाइयों से रोज दो-चार होता है और अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कैसी-कैसी हिकमतें आजमाता है और जब उसकी गाडी जरा-सी लाइन पर आती दिखती है कि व्यवस्थाजन्य उत्पात कैसे उसे मरनांतक पीड़ा पहुँचाते हुए नष्ट कर देते हैं। इसका उदाहरण है ओमी-ईशान-गोविन्द की तिकड़ी और विद्या एक चौथा कोण है,जीवन की जिदों के प्रतीक-सी वह जिन्दा रंग भरती है उपन्यास के वीरान सफों में और सबसे ऊपर है क्रिकेटर अली।
भारतीय मानस के हिसाब से चेतन ने सही नाम दिया है उपन्यास को, थ्री मिस्टेक्स ऑफ माय लाइफ। पर इसका नाम क्रिकेटर अली भी रखा जा सकता था। बारह साल के इस बच्चे की नीली आँखें जहाँ से इस उपन्यास में चमकनी शुरू होती हैं वहाँ से सारी कथा पीछे छूट जाती है ओर कहानी का एकमात्रा लक्ष्य रह जाता है,इस नन्हे अली को महान् क्रिकेटर बनाने की कथा नायकों की समवेत इच्छा और उनकी अविराम कोशिशें जिसे दंगे की घृणित आग भी जला नहीं पाती। हो क्यों नहीं, अली तो अली है,एक निर्णयक मकाम पर जब अली से अस्ट्रेलिया की नागरिकता स्वीकारने की बाबत पूछा जाता है तो वह साफ इनकार करता हुआ कहता है कि सौ जन्म बाद भी वह एक भारतीय क्रिकेटर के रूप में ही जीवित रहना पसन्द करेगा।
अली चेतन का आदर्श चरित्रा है? इस चरित्रा के अंकन में चेतन उस अंधता तक जाते हैं जिस तक कोई भी आदर्शवादी लेखक अपनी सच्ची जिद में जा पहुँचता है,इसीलिए यह सम्भव हो पाता है कि अली सा मात्र बारह-तेरह साल का लड़का देशभक्ति का जज्बा जिस तरह दर्शाता है वह सामान्य नहीं लगता। इस तरह का जज्बा उपन्यास के अन्य चरित्रों पर फबता। पर देशभक्ति के आदर्श की यही सीमा भी होती है कि अक्सर वह कच्चे दिमागों में अपनी जडें जमाता है और देश को जनसमूह के रूप में देखने की बजाय एक ईकाई के रूप में देखने लगता है,जैसे एक व्यक्ति के महान् क्रिकेटर बनने में ही जैसे मुल्क का भविष्य छिपा हो। इस तरह देखें तो इस उपन्यास का सबसे प्रभावी हिस्सा छोटी उम्र की कोरी भावुकता को ही तरजीह देता है,जैसे कि बाकी तीन समस्याग्रस्त युवकों का भविष्य यह कोरी भावुक जिद ही तय कर देगी? क्योंकि असली भारत चेतन के ये तीन युवा ही बनाते हैं,और अली चाहे जितने छक्के लगा ले वह इस युवा वर्ग को उनके संकटों के पार नहीं ले जा सकता। इस तरह यह उपन्यास उसी मानसिकता को विज्ञाप्ति करता है जिसे रोज ब रोज के हमारे समाचार पत्रा व चैनल करते हैं जो क्रिकेट को दो देशों की बीच एक जंग के रूप में प्रचारित करते हैंµऔर इस तरह एक नकली जंग में पूरे मुल्क को मुिब्तला रखकर युवा वर्ग को उसके अपने संकटों को दूर करने के सही प्रयासों से भटकाता है।
इन तथ्यों के आलोक में देखें तो लगता है जैसे चेतन एक उपन्यास को बेस्टसेलर बनाने के तमाम गुरों का इस्तेमाल एक ही उपन्यास में कर जाते हैं, व्यवसायी वर्ग,दंगा-क्रिकेट-राष्ट्रवादी और सेकुलर पार्टियों के झगडे,प्रेम व सेक्स के अंतरंग दृश्य, कुल मिलाकर चेतन भारतीय बेस्ट सेलर्स गुलशन नंदा से लेकर धर्मवीर भारती तक ऐसे लेखकों को काफी पीछे छोड़ देते हैं? हिन्दी के उपन्यासों के बरक्स देखा जाए तो वे गुनाहों का देवता और मुझे चांद चाहिए के मध्य जगह बनाते दिखते हैं। हालाँकि विवरण की बारीकियां चेतन को इन दोनों से अलग पहचान देती हैं पर जहां तक जीवन दृष्टि का सवाल है वह मुझे चांद चाहिए में ज्यादा समर्थ ढंग से अभिव्यक्त होती है।
चेतन के इस उपन्यास पर फिल्म बनने जा रही है। उपन्यास का अन्तिम हिस्सा एक फिल्म की तरह तेजी से घटता है। उसमें कल्पना का प्रयोग अविश्वसनीयता की हद तक किया जाता है। दंगाई भीड़ से जिस तरह तीनों युवा निपटते हैं वह विश्वसनीय नहीं बन पाया है। पर फिल्मों में कुछ भी संभव होता है। इस तरह चेतन उपन्यास के अंत में पटकथा लिखने लगते है। शायद व्यवसायी दिमाग की उपज है यह। अन्त में अली के शाट्स से जिस तरह मुख्य दंगाई मारा जाता है वह उपन्यासकार की व्यवसाय की प्रतिभा का प्रमाण है। चेतन के उपन्यास इस तरह हिन्दी को एक नया पाठक वर्ग भी देंगे। जैसा कि सभी लोकप्रिय रचनाकार देते हैं। उनकी तीनों पुस्तकों के हिन्दी में अनुवाद हो भी चुके हैं? यूँ हिन्दी के युवा रचनाकार चेतन से बहुत-सी बातें सीख सकते हैं,खासकर अपने परिवेश को व अन्तर्मन की बुनावट को अभिव्यक्त करने की उनकी कला?
उपन्यास का केन्द्रीय पात्रा अली हाईपर-रिपलैक्स नामक एक मनोरोग से ग्रस्त है और चिकित्सकों का मानना है कि इस बीमारी की वजह से ही अली एक ओवर की शुरू की चार गेंदों पर लगातार छक्के मारने का करतब दिखा पाता है। मनोरोग के साथ जीवन में आगे बढ़ाने की कला भी अली से सीखी जा सकती है। रिपलैक्स एक्शन में दिमाग सोचने की शक्ति और क्रिया को खत्म कर देता है। वह केवल बचाव कर सकता है...इसलिए प्रतिउत्तर का समय बहुत तेज होता है। इस क्षमता का प्रयोग कर अली बॉल की तेजी की पहचान कर उतनी ही तेजी से जवाब दे पाता है?
अपनी कमजोरियों को सकारात्मक तरीके से जानकर उनका सही उपयोग करने की कला ही जीवन की कला है। अली के चरित्रा के द्वारा चेतन इसी बात को सामने रखते हैं। उपन्यास के अन्त में अली की इसी क्षमता का चमत्कारिक ढंग से प्रयोग कराकर उपन्यासकार अपनी कहानी को एक सुखद अन्त की ओर ले जा पाता है।
प्यार के निहिताथों को भी चेतन सही ढंग से पहचानते हैं। कि प्यार साधारण जीवन स्थितियों को भी अपने सहज स्पर्श से असाधारण बना देता है। विद्या और गोविन्द के प्रेम प्रसंग इसे उचित ढंग से अभिव्यक्त कर पाते हैं। गोविन्द जब आस्ट्रेलिया जाता है तो वहाँ फोन कर पूछता है कि उसे गिफ्ट के रूप में क्या चाहिए,गोविन्द की गरीबी का ध्यान है विद्या को, सो वह कहती है कि वह समुन्दर किनारे की रेत लेता आए थोड़ी-सी। गोविन्द माचिस में रेत डालकर भारत लाता है तो उसे प्रेम से उटकेरती विद्या देखती है कि रेत में सीपी है एक। फिर वह कहती है,यह ठीक है क्योंकि जीवन के सबसे बेहतरीन तोहफे मुफ्त हैं।
यहाँ महत्त्वपूर्ण बस यह है कि एक ओर जहाँ चेतन प्रेम जैसे बहुआयामी ध्वनि वाले शब्द को उसकी ताकत के साथ अभिव्यक्त कर बाजारवाद से जूझते दिखते हैं वहीं विद्या,गोविन्द के प्रणय के अतिरिक्त दृश्य यह साबित करते हैं कि वे सतर्कता से बाजार के नुस्खों का ध्यान रखते हैं? क्योंकि पढ़ाई के वक्त प्रेमी शिक्षक और छात्रा जिस कदर यौन क्रिया में मशगूल दिखाए जाते हैं वह सहज नहीं है। और इसके परिणाम भी सही नहीं आते इसे चेतन दूसरी गलती के रूप देखते भी हैं। पर मुझे लगता है यह उपन्यासकार की एकमात्रा गलती है कि वह उपन्यास को फामूर्लाबाजी की हदों में जाने से नहीं बचा पाते। उपन्यास के अन्त में दंगे के दृश्यों को फिल्मी बनाते से चेतन यह गलती दुहराते हैं।

Wednesday, November 26, 2008

संयोगों की सत्‍ता ईश्‍वरीय सत्‍ता का निषेध करती है - कुमार मुकुल

'पूरा सच कभी किसी एक के हिस्‍से नहीं पड़ता'




स्‍टीफेन हाकिंग को पढते हुए लगता है कि पूरा सच कभी किसी एक के हिस्‍से नहीं पड़ता। अरस्‍तू से हाकिंग तक सब थोड़ा-थोड़ा बता पाते हैं। हां हाकिंग के पास पिछले अनुभवों को जोड़ने की सुविधा थी जो अरस्‍तू के पास सबसे कम थी। पर किसी आधुनिक वैज्ञानिक ने नहीं दार्शनिक अरस्‍तू ने पहली बार बतलाया था कि धरती चपटी नहीं गोल है पर उन्‍होंने यह गलत अनुमान भी लगाया था कि पृथ्‍वी स्थिर है और सूरज-चांद-तारे उसका चक्‍कर लगाते हैं।
धर्मसत्‍ता के विरूद्ध सबसे बड़ी और समझदारी भरी क्रांतिकारी स्‍थापनाएं वैज्ञानिकों ने की। धर्म हमेशा विज्ञान को ब्रह्मांड संबंधी उतनी ही जानकारी देने की छूट देता था जिससे उसके आकाशी स्‍वर्ग-नरक की परिभाषा अक्षुण्‍ण रहे। चर्च की कड़ी निगाह हमेशा विज्ञान को अनुशासित रखने की फिराक मे रहती थी।
सूर्य के चारों ओर बाकी ग्रहों के घूमने की बात भी किसी वैज्ञानिक ने नहीं पहली बार एक पुरोहित निकोलस कॉपरनिकस ने 1514 में की थी। पर अपने ही चर्च के भय से उसने यह बात गुमनाम प्रसारित की और इस सच्‍चाई तक पहुंचने में दुनिया को और सौ साल लग गए। 1609 में गैलीलियो ने कॉपरनिकस की बातों पर सहमति जाहिर की। गैलीलियो की बातों को योरप में समर्थन भी मिला पर पर चर्च के भय से आस्‍थावान गैलीलियों ने कॉपरनिकस के विचारों से खुद को दूर कर लिया। हाकिंग की यह पुस्‍तक समय का संक्षिप्‍त इतिहास इन संघर्षों का इतिहास सा है। और करीब-करीब गैलीलियों की तरह वे ईश्‍वर की अवधारणा को नकारते हुए हुए भी कहीं-कहीं उसे गोल-मोल ढंग से स्‍वीकारते भी दिखते हैं। अब यह समय पर है कि वह उनके छुपाने को किस तरह दिखाता है।
न्‍यूटन और सेव की कहानी पर संदेह करते हुए हाकिंग लिखते हैं कि जब न्‍यूटन चिंतनशील थे तो सेव के गिरने ने उनकी समस्‍या का हल निकाला। हाकिंग ने उनके गुरूत्‍वबल सिद्धांत के अंतरविरोधों पर भी उंगली रखी है कि यह विचार न्‍यूटन के भीतर भी उठा था कि अगर ब्रह्मांड में गुरूत्‍वबल समान है तो तारों को भी एक दूसरे को आकर्षित करना चाहिए था पर ऐसे में तारे स्थिर क्‍योंकर हैं।

'कोई भी भौतिक सिद्धांत एक अस्‍थायी परिकल्‍पना होता है'

स्‍टीफेन हाकिंग का कहना है कि हमने कभी इस बाबत नहीं सोचा कि ब्रह्मांड फैल रहा है या सिकुड़ रहा है...। ऐसा ब्रह्मांड के बारे में शाश्‍वत आध्‍यात्मिक धारणा के कारण हुआ। हाकिंग ब्रह्मांड के फैलने संबंधी बीसवीं सदी की धारणा को एक क्रांतिकारी स्‍थापना मानते हैं और उस पर एक अध्‍याय ही लिख डालते हैं।
हाकिंग को पढ़ते हुए एक मजेदार बात पहली बार सामने आती है कि विज्ञान के विकास में अगर धर्म हमेशा अवरोध की तरह आया तो दैवीर हस्‍तक्षेप की गंध को पसंद नहीं करने जैसे कारकों ने भी विवेचकों केा गलत निष्‍कर्ष पर पहुंचाया।
जैसे अरस्‍तू ने दैवी हस्‍तक्षेप को पसंद ना करने के कारण बह्मांड की उत्‍पत्ति के विचार को ही खारिज कर दिया। उन्‍होंने माना कि संसार सदा से है और सदा रहेगा। यह प्रलय की दैवी अवधारणा के विरूद्ध था और अवैज्ञानिक भी। जबकि प्रलय-पुनर्जन्‍म की अवधारणा खुद काल्‍पनिक और अवैज्ञानिक है।
1929 की एडविन हब्‍बल की इस खोज ने कि आकाशगंगा हमेशा हमसे दूर जा रही है ने साबित किया कि ब्रह्मांड का विस्‍तार हो रहा है। मतलब कभी यह ब्रह्मांड केंद्रित और सिमटा था। यह शुरूआत लगभग दस या बीस हजार साल पहले हुई थी। इससे यह बात सामने आई कि जब ब्रह्मांड केंद्रित था उसी समय महाविस्‍फोट नाम से एक समय था। वहीं से समय का आरंभ माना जा सकता है क्‍योंकि वहीं से ब्रह्मांड का विस्‍तार आरंभ होता है।
ब्रह्मांड के विस्‍तार पर ही हाकिंग स्रष्‍टा या ईश्‍वर के अस्तित्‍व पर सवाल उठाते हैं कि माना कि ब्रह्मांड का कोई स्रष्‍टा हो पर चूंकि ब्रह्मांड लगातार फैल रहाहै तो कहां किस बिंदू पर उसके काम को पूरा हुआ माना जाए...। स्रष्‍टा के साथ विज्ञान की भी सीमा बताते हाकिंग कहते हैं कि - इसका अस्तित्‍व केवल हमारे मस्तिष्‍क में होता है। उनके अनुसार कोई भी वैज्ञानिक सिद्धांत श्रेणियों के प्रेक्षणों के सही आकलन पर निर्भर करता है और उसमें स्‍वेच्‍छाचारिता जितनी ही कम होगी वह उतना ही वैज्ञानिक होगा। दूसरे कि वह सिद्धांत भविष्‍य की कहां तक निश्चित भविष्‍यवाणी करता है इस पर उसकी आयु निर्भर करती है। वे बतलाते हैं कि कोई भी भौतिक सिद्धांत एक अस्‍थायी परिकल्‍पना होता है जिसे कभी सिद्ध नहीं किया जा सकता। किसी भी मान्‍य सिद्धांत के आधार पर की गई भविष्‍यवाणियां जब-तक सही साबित होती हैं उसकी वैज्ञानिकता बरकरार रहती है पर अगर कभी एक भी नया प्रेक्षण उसके प्रतिकूल पड़ता है तो हमें वह सिद्धांत त्‍यागना पड़ता है। हां प्रेक्षक की क्षमता पर भी हम सदा सवाल उठा सकते हैं।

ब्रह्मांड के बारे में कोई एक तय सिद्धांत नहीं

हाकिंग स्‍वीकारते हैं कि ब्रह्मांड के बारे में कोई एक तय सिद्धांत बनाना कठिन है। इसलिए हम उसका खंड-खंड ही अध्‍ययन कर पाते हैं। हालांकि विज्ञान का यह तरीका एकदम गलत है पर अब-तक की सारी वैज्ञानिक प्रगति इसी तरीके से संभव हुई है। वे कहते हैं कि व्‍यवहार में अधिकांश नया अभिकल्पित सिद्धांत किसी पूर्व सिद्धांत का विस्‍तार होता है। दरअसल समय का संक्षिप्‍त‍ि इतिहास लिखते समय उन्‍होंने विज्ञान का इतिहास भी लिख डाला है और इस रूढि को तोड़ा है कि वैज्ञानिक खोज व्‍यक्ति के निजी प्रयासों और सनकभरी खोजों का परिणाम मात्र होते हैं। वे स्‍थापित करते हैं कि विज्ञान निजी प्रयासों और सनकभरी खोजों का नहीं , खंड-खंड में ही पर एक दूसरे से जुड़े और पूरक प्रयासों का नतीजा होता है।
इतिहास और दर्शन की तरह विज्ञान की भी रूढियां होती हैं। जो नयी खोजों से टूटती रहती हैं। हाकिंग ने पहली बार विज्ञान को मनुष्‍य की जिज्ञासा और उसके दर्शन , इतिहास संबंधी अभिरूचियों से जोड़ा है। इससे पहले आइंस्‍टाइन ने भी ऐसा किया था। आइंस्‍टाइन ने समाजवाद और गांधीवाद पर भी अपना दृष्टिकोण जाहिर किया था। इस तरह हाकिंग विज्ञान के इतिहास में आइंस्‍टीन की अगली कड़ी हैं। इस तरह हाकिंग विज्ञान की उस धारा को आगे बढाते हैं जो विज्ञान को सनक से जोड़कर धर्म को उसकी राह में अवरोध खड़ा करने की छूट नहीं देता है। आइंस्‍टीन के विरूद्ध उनके समय में सौ लेखकों ने मिलकर एक किताब लिखी थी , जिसके बारे में आइंस्‍टीन का जवाब था कि - यदि मैं गलत होता तो मेरे लिए एक ही काफी होता।
हाकिंग ने अपनी पुस्‍तक में उपसंहार के बाद आइंस्‍टाइन, गैलीलियों, न्‍यूटन आदि की अति संक्षिप्‍त और रोचक चर्चा भी की है। ये तीनों अलग-अलग विज्ञान की तीन धाराओं का प्रतिनिधित्‍व करते हैं। तीनों में गैलीलियो जहां धर्मभीरू हैं न्‍यूटन तानाशाह हैं तो वहीं आइंस्‍टाइन खरी बोलने वाले हैं। हाकिंग न्‍यूटन के प्रति एक हद तक अपनी नापसंदगी भी दिखलाते हैं। न्‍यूटन की तानाशाही को बाद में एक सनक के रूप में प्रचारित किया गया।
मीडिया में हाकिंग की चर्चा उनकी विकलांगता और कंम्‍पयूटर के चमत्‍कारों को लेकर है जो उनसे चिपका है। उनकी चेतना की चर्चा कम हाती है जो हाकिंग को हाकिंग बनाती है। यह हमारी मानसिक विकलांगता भी है कि हम कोई भी चर्चा चमत्‍कारों और उनकी दयनीयता से अलग हटकर नहीं कर पाते। क्‍येांकि चमत्‍कारेां को कभी भी दैवीय एंगल दिया जा सकता है और चूं-चूं करती दया भी इसमें सहायक होती है। जबकि हाकिंग पहली बार विज्ञान को ऐतिहासिक और सुसंब्‍द्धता प्रदान कर धर्म के विरूद्ध विज्ञान की पिछली चुनौतियों को तीखा करते हुए उसे एक सुचिंतित आधार प्रदान करते हैं।

योग्‍यता वस्‍तुत: वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना है

जीवन जगत के सवालों को हम कहां तक हल कर सकते हैं का जवाब देते हुए हाकिंग अपना जवाब डार्विन के प्राकृतिक चयन पर आधारित करते हुए उस आगे बढाते हैं। डार्विन का कहना है कि - जीवन की विभिन्‍नताएं जाहिर करती हैं कि कुछ लोग:प्रजाति अन्‍य से ज्‍यादा योग्‍य है। इस योग्‍यता को पहले ताकत के रूप में देखा जाता था इसलिए इसे - वीर भोग्‍या वसुंधरा - कहा जाता था और इसे आलोचित भी किया जाता था। पर हाकिंग ने यह कहकर इसे आगे बढाया कि - योग्‍यता वस्‍तुत: वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना है। इस तरह जो मानव समूह वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाता गया वह उत्‍तरजीवितता के इस संघर्ष में आगे बढा। यहां पर वे विज्ञान की ध्‍वंसात्‍मक शक्ति की ओर भी ईशारा करते हैं। और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को गलत तरीके से लागू करने से ब्रह्मांड के मनुष्‍यों-जीवों सहित विनाश की संभावना से भी इनकार नहीं करते। दरअसल ऐसा कहते हुए वे विज्ञान के रूढि बनने की ईशारा करते हुए उससे बचने की बात करते हैं।
डार्विन को खारिज करते हुए हिन्‍दी के कवि निराला लिखते हैं- योग्‍य जन जीता है , पश्चिम की उक्ति नहीं गीता है गीता है। हाकिंग के हिसाब से ऐसी रूढियां खतरनाक हो सकती हैं। गीता में विज्ञान रहा होगा पर आज अगर विज्ञान विकास के नये सोपान पर जा चुका है तो चाहे वह पश्चिम में हो या पूरब में हमें गीता काल के विज्ञान पर नहीं अटके रहना चाहिए। वर्ना हम नष्‍ट हो जाएंगे।
हाकिंग की किताब अंतरद्वंद्वों को जबरदस्‍त ढंग से उभारती है पर पाठक पर अपना कोई मत थोपने से भी बचती है। उसे वह अपना पक्ष चुनने की स्‍वतंत्रता देती है। वह पक्षों के खतरे से भी उन्‍हें अवगत कराती चलती है। वे इस जिज्ञासा को बल प्रदान करती चलती हैं कि हम कभी ना कभी जीवन-जगत के प्रश्‍नों का हल तलाश कर लेंगे। पर वह काल कल आएगा या कई प्रकाश वर्ष दूर होगा इसकी घोषणा से भी बचते हैं। जैसे जीनोम की खोज पर कुछ लोग बवेला मचा रहे हैं कि अब दुनिया से जैसे गैरबराबरी मिट जाएगी। चूंकि सबकी जैविक बनावट निकट की है , पर हमें गैरबराबरी जमीन पर मिटानी होगी , खोजों से बराबरी साबित कर देने से बराबरी नहीं आने वाली।

संयोगों की सत्‍ता ईश्‍वरीय सत्‍ता का निषेध करती है

हाकिंग संयोगों की सत्‍ता पर विशेष जोर देते हैं। इस सत्‍ता को पुष्‍ट करने वाले‍ विज्ञान के क्‍वांटम सिद्धांत और अनिश्चितता के सिद्धांत को वह विश्‍व की आधारभूत संपत्ति मानते हैं। अनिश्चितता का सिद्धांत बीसवीं सदी के जर्मन वैज्ञानिक वर्नर हाइजेनवर्ग की खोजों पर टिका है। उनकी खोजों का आधार यह है कि - किसी भी कण के वेग और उसकी स्थिति को आप एक साथ शुद्ध-शुद्ध नहीं नाप सकते। और अगर एक कण की स्थिति को आप नहीं नाप सकते तो ब्रह्मांड का आकलन ठीक-ठीक कैसे किया जा सकता है। आइंस्‍टाइन ने भी क्‍वांटम के सिद्धांत में सापेक्षता का सिद्धांत जोड़ और इसके लिए ही उन्‍हें नोबेल से नवाजा गया था। यूं आइंस्‍टाइन नहीं स्‍वीकार सके कि ब्रह्मांड संयोगों से नियंत्रित होता है,इसीलिए आइंस्‍टाइन का सिद्धंत परंपरिक कहलाया।
दरअसल संयोगों की सत्‍ता ईश्‍वरीय सत्‍ता का निषेध करती है। जहां सब-कुछ ईश्‍वर की मर्जी से पहले से तय होता है। आइंस्‍टाइन का प्रसिद्ध कथन है- ईश्‍वर पासा नहीं फेंकता।
ज‍बकि हाइजेनवर्ग का अनिश्चितता का सिद्धांत इस पर निर्भर है कि कण कुछ हद तक तरंगों की तरह व्‍यवहार करते हैं,उनकी कोई निश्चित स्थिति नहीं होती।
अधिकांश वैज्ञानिक अक्‍सर अपने पिछले आकलनों को ही आगे नकारने लगते हैं। हाकिंग से आइंस्‍टाइन तक सबका यही हाल है और यह भैतिक विज्ञान की प्रामाणिकता पर एक प्रश्‍न चिन्‍ह है। एक तरफ न्‍यूटन जैसे वैज्ञानिक हैं जो अपने विपरीत पड़ने वाले किसी भी शोध और शोधक को आगे आने से रोकने में सारी ताकत लगा देते हैं। उनके लिए अपना सच अंतिम होता है दूसरी ओर हाकिंग और आइंस्‍टाइन जैसे ढुल-मुल लोग हैं।
कृष्‍णविवर काले नहीं श्‍वेत तप्‍त होते हैं। जो कृष्‍णविवर जितना छोटा होता है वह उतना ही ज्‍यादा चमकता है और उनका पता लगाना आसान होता है। हाकिंग का कहना है कि एक छोटा कृष्‍णविवर पृथ्‍वी के पास होतो उसके सामने एक विशाल द्रव्‍यराशि को रखकर कृष्‍णविवर को धरती पर उसी तरह खींचा जा सकता है जैसे एक गदहे को गाजर दिखाकर। और उसे पृथ्‍वी के चारेां ओर की कक्षा में स्‍थापित किया जा सकता है। पर आगे हाकिंग अपनी इस कल्‍पना या परिकल्‍पना को खुद अव्‍यावहारिक बताते हैं और कहते हैं कि अपनी आयु पूरी करने पर कृष्‍ण विवरों का विस्‍फोट होता है।

टिप्‍पणियां-

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…
तारे क्या चीज हैं। कुछ भी स्थिर नहीं है। स्थिर हो तो काल जई नहीं हो जाएगा। जो आज तक कोई नहीं हुआ।
June 23, 2008 2:41 AM

pallavi trivedi ने कहा…
ham to aaj tak kauparnikas ko scientist hi samajhte aaye the..pahli baar pata chala ki wah ek purohit tha!
June 23, 2008 5:09 AM

Udan Tashtari ने कहा…
पूरा सच समझने के लिए अगले भाग का इन्तजार कर रहे हैं.

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…
बहुत दिलचस्प पुस्तक है। कोई दस वर्ष पहले पढ़ी। फिर मेरी प्रति कोई पढ़ने को ले गया लौट कर आज तक नहीं आई। विश्वोत्पत्ति के सिद्धान्त ही हो सकते हैं। नियम नहीं, और सिद्धान्त होंगे तो अनेक होंगे।
हॉकिन्स ने यह भी कहा है कि पहले वैज्ञानिकों को आगे बढ़ने के लिए दार्शनिक रास्ता सुझाते थे। वैज्ञानिक उन की अवधारणाओं को पुष्ट या खारिज करते थे। लेकिन अब लगता है दार्शनिक चुक गए हैं और विज्ञान को आगे का मार्ग स्वयं तलाशना पड़ रहा है।
आप लिखिए। इस पुस्तक के बारे में लिखा जाना और पढ़ा जाना जरूरी है। वैसे अंग्रेजी में यह ई-पुस्तक के रूप में उपलब्ध है। मेरे पास उस की एक प्रति सुरक्षित है।
August 9, 2008 10:10 PM

उन्मुक्त ने कहा…
मैंने यह पुस्तक अंग्रेजी में पढ़ी है। हिन्दी में भी प्रकाशित हो गयी जानकर अच्छा लगा।
पर यह उतनी पसन्द नहीं आयी जितना इसका नाम है।
August 10, 2008 1:17 AM

संगीता पुरी ने कहा…
जब से पंडितों, पुरोहितों ने परंपरागत व्यवसाय के रूप में धर्म और ज्ञान को स्थान दे दिया ,स्थिति विकट होती चली गयी। वैज्ञानिकों का काम बढ़ता चला गया।
August 10, 2008 1:33 AM

Umesh ने कहा…
जितना हम जानते है, उससे अनंत गुणा ऐसा है जो हम नही जानते । स्टीफन हाकिंगस की पुस्तक मे बहुत सी बातें दिमाग के उपर से निकल जाती है । हम खुद को बुद्धीजीवी दिखाने के लिए भी ईस प्रकार की पुस्तकों की प्रशंसा करते है । नेपाली मे एक पुस्तक पढी थी, " माया तथा लिला ", यह पुस्तक बेजोड है । वेदांत तथा क्वांटम थ्योरी के साम्य तथा ब्रहमाण्ड उत्पती के सिद्ध्न्तो पर से बखुबी से पर्दा उठाने का प्रयास करती है यह पुस्तक । लेखक का नाम शायद अरुण कु सुबेदी है ।
August 10, 2008 6:49 AM

हकीम जी ने कहा…
हॉकिन्स के विचारों की मैं बहुत कद्र करता हूँ ..पुस्तक में लेखक भी अपनी ही बात पर अडा होना चाह रहा है ..
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ती कैसे हुई .. इस विषय पर दुनीया में कई सिद्धांत विभिन्न कालो में प्रतिपादित होते रहे . कई प्राचीन सिद्धांतो कों नवीन रूप दिया गया तो कई प्राचीन सिन्द्धान्तो का निरूपण किया गया ..बफ़्फन कांट , चैम्बरलैंड, मोलटन, जींस ,जेफ्रीज, नॉर्मन, हेनरी,रोजगन, शिमन्ड,वेज्सेकर और भी ना जाने कीतने ही विद्वानों ने समय समय पर ब्रामांड के बारे में जानने की कोशीश की ,, .. मुआफ करना दोस्त अब जो मैं बात कहने जा रहा हूँ शायद वो आपके दील के संवेदनशील भाग से गुजरे...हिन्दुस्तान में कभी भी हमने धर्म से अलग होकर नहीं सोचा तर्क की कसौटी भारत में बेअसर है ..और ना ही हम लोगो ने दर्शन और इतिहास से बहार नीकल कर सोचा ..एक इतिहास कार या दार्शनिक ब्रामांड के बारे में क्या बता सकता है सिवाय दार्शनिकता के..जरुरत है उन नई तकनीको और ज्ञान की जो इस बारे में हमें सच्चाई कों बताये अपने सिद्धांतो से तर्क का निरूपण करे...मुर्ख व्यक्ती तो हमेशा येही कहता रहेगा की तो फिर तारे कहा से बने , इस संसार कों कौन चला रहा है ,सूरज किसने बनाया , वे कारण नहीं खोजते ..खासतौर से हिन्दुस्तान में अगर आप इन चीजो के सही कारण खोजोगे तो वे आपको धर्म का विरोधी करार कर देंगे...

क्रोध,चिंता आदि भावावेग सोद्देश्‍य होते हैं - कुमार मुकुल

सहज बुद्धि के आधार पर मन पर नियंत्राण रखना ही जीवन का सबसे बड़ा अर्थ है। एडलर लिखते हैं कि ``जीवन का अर्थ है, मैं अपने साथी मनुष्यों में दिलचस्पी लूं, सम्पूर्ण का एक अंश बनूं, मानव-मात्र की भलाई के लिए अपना कर्तव्य-भाग निबाहूं।´´ वे मानते हैं कि दुनिया के सभी विफल मनुष्य ``दूसरों में दिलचस्पी नहीं लेते और सामाजिक भावना नहीं पैदा करते।´´ वे जीवन का अपना निजी अर्थ लगाते हैं।
सच्चाई और वास्तविकता का अर्थ वे मानव के लिए सच्चे और वास्तविक होने से लगाते हैं। अन्य सारी सच्चाइयों को वे व्यर्थ बताते हैं। मन को समाजोन्मुखी बनाने की बात करते एडलर उसकी वैयक्तिकता को नहीं भूलते। वे मानते हैं कि जीवन के उतने ही अर्थ हैं जितने कि मनुष्य। और इसीलिए इन निजी अथों में भूल की गुंजाइश हमेशा रहती है। निजी अर्थ भी सच होते हैं पर वे निजता से सीमित और अधूरे होते हैं और इसलिए भूलों का कारण बनते हैं। इसलिए अथों की कसौटी सामूहिकता है मनमानी नहीं। वे कहते हैं कि जीवन से जुड़ी हर चीज का अर्थ मनुष्य के लिए उसकी आवश्यकता और उससे उसके संबंधों पर निर्भर करता है। चीजों का कोई स्वतंत्र अर्थ नहीं होता।
वे पाते हैं कि वैयक्तिक मनोविज्ञान की सारी समस्याए¡ व्यक्ति के व्यवसाय, समाज और यौन जीवन संबंधी उसके विचारों से जुड़ी होती है। इन सब का हल सहयोग, सन्तुलन और प्रेम-जीवन पर निर्भर करता है। वे कहते हैं कि आपका जीवन तभी सार्थक होगा जब दूसरों के लिए उसका कुछ अर्थ होगा। क्योंकि वैयक्तिक अथों की कभी परीक्षा नहीं ली जा सकती उसकी कसौटी वह व्यक्ति ही होता है और वह खुद अपना महत्‍व कैसे प्रतिपादित कर सकता है। व्यक्ति का महÙव सामाजिकता- सामूहिकता की कसौटी पर ही कस कर जाना जा सकता है। जीवन के सच्चे अथों की कसौटी साधारण है जिसमें दूसरा हिस्सा बंट सके, ``संपूर्णता में अपना अंश प्रदान´´ कर सकें। `प्रदान को ही वे जीवन का सच्चा अर्थ मानते हैं कि जिस दुनिया में हम काम शुरू करते हैं वह हमें पूर्वजों ने हमें ऐसी प्रदान की है जिसमें हम काम कर सकें और इस दुनिया को आगे वालों के लिए और अनुकूल बनाना ही जीवन का अर्थ हो सकता है। एडलर लिखते हैं कि वैसे असहयोगी लोग जो केवल यही पूछते हैं कि ``मैं जिन्दगी से क्या पा सकता हूं।´´ वह केवल मर ही नहीं चुके हैं, उनका सारा जीवन ही व्यर्थ है।
वे कहते हैं कि वैयक्तिक मनोविज्ञान नियतिवाद के सिद्धान्त को नष्ट कर देता है, कि अपने अनुभवों को जो अर्थ हम देते हैं वही हमारी नियत की रेखा को निधाZरित करता है कि परिस्थितियों को हमेशा परिभाषित करने की जरूरत होती है और यही हमारा भविष्य निधाZरित करता है।
एडलर ने पहली बार शोध कर यह पाया कि विकृत अंगों वाले और बीमार बच्चों में विफलता की संभावना ज्यादा रहती है। जो शरीर वातावरण की मांग को पूरा नहीं कर पाता उसे मन बोझ के रूप में लेता है और यहीं से गड़बड़ी शुरू होती है। उनकी अपंगता के प्रति अगर समाज में या परिवार में सही व्यवहार नहीं मिला तो वे समाजोन्मुख होने की जगह आत्मकेंद्रित होते चले जाकर बर्बाद हो सकते हैं। पर इसे वे कोई नियम नहीं मानते क्योंकि बहुत बार उल्टा भी होता है और जो विकलांग बच्चे सहयोग की ताकत को पहचान लेते हैं और संघर्ष करते रहते हैं वे बहुत बार ठीक-ठाक अंगों वाले बच्चों को भी पीछे छोड़ देते हैं।
विकलांग बच्चों की तरह लाड-प्यार से पले बच्चों में भी बर्बादी के अवसर ज्यादा देखते हैं। ऐसे बच्चे केवल पाना जानते हैं और देना नहीं जान पाते और बोझ बन जाते हैं। इसी तरह उपेक्षा का दंश भी बच्चे को विकसित नहीं होने देता। एडलर बताते हैं कि ``कोई भी दूसरा अनुभव नहीं है जो नि:स्वार्थ प्यार की जगह ले सके।´´ और इस संदर्भ में वे मां की भूमिका को बहुत जरूरी मानते हैं क्योंकि वही बच्चे को बाकी विश्व से जोड़ने वाला जरूरी पुल है। अगर बच्चे ने माता से खुद को उपेक्षित महसूस किए तो इस कमी को शायद ही भरा जा सके। क्योंकि आरम्भ के पांच सालों में ही बच्चे की समझदारी की नींव पड़ती है। किसी व्यक्ति के मानस की विकृतियों को जानने के लिए उसके बचपन के संस्मरणों को एडलर सबसे जरूरी साèान मानते हैं। क्योंकि वहीं उसकी ग्रंथियों की गुत्थी छुपी होती है।
एडलर लिखते हैं कि ``गति की दिशा को पहले ही भांप लेना मन की केंद्रीय शक्ति है।´´ पर चूंकि मन को शरीर में ही रहना है इसलिए वह भी एक जरूरी फैक्टर है क्योंकि गति तो शरीर ही करेगा। पर एडलर गलतियों के लिए मन को ही दोषी ठहराते हैं क्योंकि निर्देशन वही करता है। इसलिए एडलर मन को ही नियंत्रिात करने और उसे समाजोन्मुखी बनाने की बात करते हैं। क्योंकि मन अगर खुद सारे फैसले लेने लगे तो मनमानी होगी उसी सहज बुद्धि के आèाार पर काम करने को तैयार करना ही मनुष्य का अभिष्ट है।
व्यक्ति के मनोविज्ञान की तह में जाते एडलर बताते हैं मनुष्य की हर भावना चाहे वह क्रोध और चिन्ता ही क्यों न हो एक उद्देश्य को लेकर प्रकट होती है। भावना के नाम पर दरअसल आदमी छूट चाहता है अपनी मनमानी की। वे लिखते हैं कि ``हमारा अनुभव बताता है कि क्रोध एक ऐसा ढंग है जिसे किसी व्यक्ति अथवा स्थिति पर काबू करने के लिए बरता जाता है।´´ वे शारीरिक व मानसिक अभिव्यक्तियों को जन्मजात कहकर उसके नाम पर छूट देना नहीं चाहते बल्कि उसकी तह में छुपे उद्देश्यों तक जाना चाहते हैं।
एडलर पाते हैं कि मन का शरीर पर प्रभुत्व रहता है और इसीलिए उसके मन के भावों को हम उसके शारीरिक क्रिया कलापों में अभिव्यक्त होते पाते हैं। एक कमजोर आदमी की कमजोरी उसके आचरण में भी प्रकट होती रहती है और विशाल शरीर का आदमी भी मन से कमजोर होने पर लुंज-पुंज दिखता है। इसलिए वे मन और शरीर को अलग-अलग नहीं उनकी पारस्परिकता में देखने का आग्रह करते हैं। वे कहते हैं कि मन का मस्तिष्क पर भी गहरा प्रभाव रहता है इसलिए सिर पर चोट से अगर कभी मस्तिष्क का एक हिस्सा बेकार हो जाता है तो कभी-कभी मन की ताकत से मस्तिष्क का दूसरा हिस्सा उस कमी को पूरा करने का चमत्कार भी कर दिखाता है।
एडलर कहते हैं कि ``सहयोग की कमियों का ज्ञान ही मनो- विज्ञान है।´´ और मनोविकृतियों को दूर करने के लिए वे सहयोग आधारित जीवन प्रणाली की वकालत करते हैं। क्योंकि व्यक्ति की जीवन प्रणाली में ही उसके मन की गड़बड़ी के सूत्रा होते हैं और उस प्रणाली को बदल कर ही उनसे निजात पाई जा सकती है।

हीनताबोध-श्रेष्‍ठताबोध और एडलर

हीनभाव यानि इन्फीरिआरिटी काम्प्लैक्स के बारे में एडलर का मानना है कि इसका जिस व्यापक स्तर पर प्रयोग होता है उसके अनुपात में कम ही लोग इसे ठीक से समझ पाते हैं। हीन भाव थोड़ा-बहुत सबमें होता है क्योंकि हर आदमी के आसपास कुछ ऐसी स्थितियां होती हैं जिनको वह सुधारना चाहता है। किसी को हीन भाव से पीिड़त बतलाना उचित नहीं। क्योंकि ऐसा करने से रोगी अपनी उस ग्रंथी से निपटने की जगह उसे और महत्व देते हुए अपनी श्रेश्ठता का प्रदर्शन करेगा। एडलर के अनुसार हर स्नायु-रोगी यानि न्यूरोटिक हीनभाव का शिकार होता है, हां उसका विकार अलग अलग तरीके का हो सकता है। कुछ लोग बोलते समय अपने हाथ पांव को जरूरत से ज्यादा हिलाते हैं ऐसे लोगों का अपनी बोली पर विश्‍वास कम होता है इसलिए उस पर जोर देने के लिए वह अपने अन्य अंगों को हिलाता है। हीन भाव से ग्रस्त व्यक्ति जरूरी नहीं कि हीन या दबा हुआ दिखे वह इसके विपरीत आचरण भी कर सकता है। जैसे जिस बच्चे में अपने छोटे होने का भय हो वह कुछ तनकर चलने का प्रयास करता दिख सकता है। कोई व्यक्ति अपने हीनभाव को ऐसे ही लगातार लादे नहीं चल सकता वह उससे उबरने का प्रयास अपने तरीके से करता है। संभव है कि वह प्रयास करके भी उससे उबर ना सके और तनाव मेें आ जाए पर वह प्रयास करता जरूर है। अत्याचार और कठोर व्यवहार के कारक के रूप में भी इस हीन भाव की भूमिका तलाशी जा सकती है। अपने कार्य क्षेत्रा में अच्छा प्रदर्शन ना कर पाने वाला व्यक्ति अपने घर या अपने मातहतों के बीच कठोर व्यवहार कर अपने हीन भाव का प्रदर्शन करता है। हीन भाव का विश्‍लेषण करते एडलर कहते हैं कि हीन भाव से निपट ना पाने वाला व्यक्ति अक्सर श्रेष्‍ठता की अनुभूति की ओर जाना चाहता है पर यह कोई सकारात्मक प्रयास नहीं है। ऐसा व्यक्ति सफलता की ओर बढ़ने की जगह पराजय से बचने में अधिक समय गंवाता है और ऐसा करते हुए अपना कार्यक्षेत्र सीमित करता आत्महत्या की परिस्थितियां तक पैदा कर लेता है। एडलर के अनुसार आत्महत्या भी श्रेष्‍ठता भाव की ही एक परिणति है कि उसने आत्महत्या इसलिए की कि अपने जीवन की परिस्थितियों में आत्महंता के पास इससे बेहतर विकल्प नहीं थे। उनके अनुसार आत्महत्या हमेशा एक शिकायत या बदला हुआ करती है कि ऐसा करने वाला अपनी परिस्थितियों का दोश दूसरों के सिर मढ़ता है कि वह उसे समझ नहीं सका। हीन भाव से ग्रस्त व्यक्ति दूसरों पर हावी होना चाहता है चाहे यह काम रोब गांठकर हो या गिड़गिड़ाकर। रोकर या चीखकर जब एक बच्चे को कुछ हासिल होता है तो आगे यही आदत उसे एक उदास प्रकृति का व्यक्ति यानि मेलोन्कोलियॉक बना डालता है। ऐसे लोग सहयोग करने की जगह आंसू बहाकर अपनी बात मनवा लेना चाहते हैं। ऐसे लोग अपनी कमजोरी को अक्सर स्वीकार लेते हैं पर जिस चीज को वे छिपाते हैं वह श्रेष्‍ठता का भाव होता है। इसी तरह शेखी बधारने वालो बच्चा देखने में श्रेष्‍ठता का प्रदर्शन कर रहा होता है पर इसके भीतर वही हीन भाव होता है। हस्तमैथुन, स्वप्नदोश, नपुंसकात और विपरीत रति दूसरे लिंग के प्रति अपर्याप्तता के हीनभाव का ही परिणाम होते हैं। इस सबके बावजूद एडलर हीनभाव को मानव जाति की उन्नति के कारक के रूप में देखते हैं। विकास का सार प्रकम ही हीनभाव की उपज है कि आखिर सुख,सुविधा और सुरक्षा के इतने इंतजाम मानव के लिए ही क्यों हैं , क्योंकि नििष्चत ही मानव खुद को स़ष्टि का दुर्बलतम प्राणी समझता है। पशुओं के मुकाबले मनुष्‍य को बचपन से ही जिस असुरक्षा के बीच अपना जीवन बिताना पड़ता है वह एक ओर इस हीनभाव और दूसरी ओर उसके विकास का कारक है। आदमी के बच्चे केा खड़ा होने और चलने में सालभर लग जाते हैं जबकि पशु शावक जन्म के कुछ देर बाद ही चलने लगता है। इन कठिनाईयेां केा एडलर मानव जाति का सौभग्य मानते हैं। जिसके हल ढूंढने के क्रम में वह न जाने क्या-क्या ढूंढ लेता है। एडलर का मानना है कि साधाण मनुष्‍य अपनी समस्याओं का हमेशा अच्छे से अच्छा हल ढूंढ लेता है। वह हमेशा दूसरों को कुछ देता है वह किसी पर बोझ नहीं बनता ना उसे अनुकम्पा सामाजिक भावना और सहयोगी रवैये के साथ वह कठिनाईयेां को हल करता आगे बढ़ता चला जाता है। एडलर बताते हैं कि -किसी की जीवन प्रणाली को समझना किसी कवि की कृति को समझने के समान है। कवि को तो शब्दों का प्रयोग करना ही पड़ता है, परन्तु उसका आभिप्राय तो उन शब्दों से कहीं अधिक होता है जिनका वह प्रयोग करता है। उसके अभिप्राय का अधिकांश तो अनुमानगम्य ही होता है, पंक्तियेां के बीच उसकी खोज करनी पड़ती है। यही वैयक्तिक जीवन प्रणाली की दशा है जो अगाध और बहुत उलझी हुई संश्लिष्‍ठ हुआ करती है। मनोवैज्ञानिक को पंक्तियेां के बीच में पढ़ना होगा, यह आवश्‍यक होगा कि जीवन का अभिप्राय परखने की कला वह सीखे। ईश्‍वर तुल्य होने ओर महामानव के विचार को भी एडलर श्रेष्‍ठताग्रंथि की उपज मानते हुए कहते हैं कि जब जर्मन दार्शनिक नीत्से पागल हो गया था तो वह पत्रों में अपने हस्ताक्षर शहीद लिखकर करता था। उनके अनुसारी प्राय: पागल व्यक्ति अपनी श्रेष्‍ठता के ध्येय स्पष्‍ठ रूप में व्यक्त करते हैं। श्रेष्ठताबोध से पीडित व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता। क्योंकि उनके अनुसार प्रेम दुर्बलता की निशानी होता है। ऐसे लोग प्रेम से भागने का बचने का अभ्यास करते हैं। इससे बचने के लिए वह ऐसी स्थिति को उपहास में उड़ा देने की कोशिश करता है। एडलर कहते हैं कि - कई लोग प्रेम में होने पर दुर्बल अनुभव किया करते हैं, और कुछ हद तक वह ठीक होते हैं। उनके अनुसार केवल वही व्यक्ति प्रेम की पारस्परिक निर्भरता से बचे रहने का प्रयत्न करेगा जिसका श्रेष्ठता संबंधी ध्येय यह कहता है - मुझे कभी दुर्बल नहीं होना है, मुझे कभी भी अरक्षित नहीं रहना है। जिस व्यक्ति से ऐसे लोगों को प्रेम होने का भय होता है उनका वे उपहास उड़ाते हैं। बच्चों द्वारा चोरियां किए जाने और दूसरे की बुराई करने को भी वे श्रेष्ठताबोध से जोड़ते हैं। उनका यह भी मानना है कि जहां भी झूठ बोलने का मामला दिखे, हमें उसका कारण कठोर माता अथवा पिता में तलाश करना पड़ेगा। श्रेष्ठता की इस कुंठा को समझने के लिए वे सलाह देते हैं कि हमें खुद को उनकी स्थितियों में रख कर देखना चाहिए तभी हम इसकी तह में जा सकते हैं। कि श्रेष्ठता की ओर जाने का प्रयास ही प्रगति के मूल में है पर कहां से यह बंधन के रूप में बदलने लगता है इस पर विचार करना चाहिए। उनका स्पष्ट मत है कि -जो व्यक्ति जीवन की समस्याओं का वास्तव में सामना कर सकते हैं और उनपर विजय पा सकते हैं वह वही होते हैं जो अपने प्रयत्नों से सभी को लाभ पहुंचाने की प्रवृत्ति दिखाते हैं, जो इस तरह आगे बढ़ते हैं कि दूसरे भी फायदा उठाएं।

सपने हमारी जीवन प्रणाली के हिस्‍से हैं

सपने को लेकर हमेशा हम एक संशय में रहे हैं कि जैसे वे कोई रहस्‍य हों। दूसरी ओर सपनों को लेकर एक अतिरेकी विचार यह भी है कि जो सपने नहीं देखता वह बड़ा नहीं हो सकता। पर वैज्ञानिक और मनोचिकित्‍सक डॉक्‍टर एल्‍फ्रेड एडलर को पढ़ने के बाद मुझे अपने विचारों को बदलना पड़ा और लंबे समय से चला आ रहा कुहासा छंटा। एडलर यह साफ करते हैं कि स्‍वप्‍न हमारी जीवन प्रणाली के हिस्‍से होते हैं और उनका व्‍यक्ति के मूल स्‍वभाव से अलग कोई अर्थ नहीं होता।
वे बताते हैं कि सपने अक्‍सर हमें धोखा देते हैं क्‍यों कि हम उन्‍हें समझने की जहमत कम उठाते हैं और उनका भ्रमप्रर्ण अथै लगाना आसान होता है। पर अगर हम हम उन पर ध्‍यान देने लगें तो वे हमें धोखा नहीं दे पाएंगे। उनके अनुसार आदमी को अपनी सहज बुद्धि के अनुसार चलना चाहिए और सपनों के धोखे से बचना चाहिए क्‍योंकि वे अक्‍सर एक आसान हल की ओर ईशारा करते हैं।

अधिकांश लोग उड़ने के सपने देखते हैं, एडलर बताते हैं कि हम अपनी समस्‍याओं का हल बिना मिहनत किए पा लेना चाहते हैं। सपने एक तरह से तोष देते हैं कि यथार्थ में ना सही आपने सपने में तो अपनी समस्‍या का हल पा ही लिया। इसी तरह लोग गाड़ी छूटने का सपना देखते हैं यह इंगित करता है कि हम बिना प्रयास किए अपनी समस्‍या का हल पा लेना चाहते हैं। मुझे कुछ देर से इस तरह चलना चाहिए कि गाड़ी छूट जाए और उसका सामना ना करना पड़े।
इसी तरह किसी समस्‍या को सामने पा आ असहज हो उठते हैं तो आपको परीक्षा के सपने आ सकते हैं। इसका मतलब कुछ लोगों के लिए यह हो सकता है कि उस समस्‍या को सामने पा व्‍यक्ति परेशानी में पड़ गया और उसे परीक्षा की तरह ले रहा है। कुछ लोगों के लिए जो ऐसी समस्‍याओं से आसानी से पार पा चुके हैं इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि यह भी एक परीक्षा है और वो इससे पार पा लेंगे। इस तरह सपनों के अर्थ उस व्‍यक्ति के जीवन संदर्भों में ही निकलेंगे उसका कोई आकाशी रहस्‍यमय अर्थ नहीं होगा।

एडलर के अनुसार हर सपने का अर्थ खुद को मदहोश करना और आत्‍मसम्‍मोहित करते हुए मूल समस्‍या से बच कर निकलने का प्रयास करना है कि सपने आत्‍मवंचना को बल देते हैं। कि स्‍वप्‍न भी सोद्देश्‍य होते हैं। सपने में व्‍यक्ति अपनी स्‍मृति से ही चुनाव करते हैं जो श्रेष्‍ठता के उसके निजी ध्‍येय का पक्ष लेते हैं। इस तरह सपने में हम उन्‍हीं घटनाओं में से चुनाव करते हैं जो हमारी जीवन प्रणाली से मेल खाते हैं।

महान मनोविश्‍लेषक फ्रायड का मत है कि सपनों का निर्माण अलंकारों और प्रतीकों से होता है। एडलर सवाल करते हैं कि आखिर सपने अलंकारों और प्रतीकों की जगह सरल सीधी भाषा में क्‍यों नहीं व्‍यक्‍त्‍ होते। वे कहते हैं कि अलंकार वाणी के भू‍षण माने जाते हैं पर उनका प्रयोग कर हम हमेशा अपने को धोखा देते हैं। जारी...

Friday, November 7, 2008

चेखव और लीडिया - एक प्रेम कथा

उम्र भर एक मुलाकात चली आती है ...



अपनी भयाक्रांत शीर्षक कविता में होर्खे लुइस बोर्खेस लिखते हैं - यह प्रेम है।मुझे गोपन रहना होगा अथवा पलायन करना होगा। इस कैदखाने की दीवारें बढ़ती जाती हैं, जैसे किसी डरावने स्‍वप्‍न में।
लीडिया एविलोव की पुस्‍तक मेरी जिन्‍दगी में चेखव को पढते हुए जैसे प्‍यार के निहितार्थ नये सिरों से खुलते हैं। अपने सहज, सरल ढंग से। कैदखाने की दीवारें और डरावने स्‍वप्‍न वहां भी हैं पर वे बोर्खेस की कविता की तरह भयाक्रांत नहीं करते बल्कि खीचते हैं जैसे समुद्र खींचता है चाहे आप तैरना जानते हों या ना जानते हों ...। इसे पढते हुए लगता है कि प्‍यार अपने अनुभवों के प्रति एक निजी आ्ग्रह है जो रूढिगत आचरणों को दरकिनार करता अपनी रौ में बढता जाता है। यह कबीर की आंखिन देखी है जिसे आंख वाला दुनियावी दबाव में अपनी नजरों से दूर नहीं कर पाता, चाहे इसकी जो कीमत उठानी पडे।
इस पुस्‍तक को पढते लगा जैसे सारा लेखन आदमी के प्‍यार की ही अभिव्‍यक्ति होता है। अपने देखे-गुने हुए के प्रति एक सच्‍ची जिच से ही लेखन पैदा होता है। चेखव कहते हैं - लेखक को वही लिखना चाहिए जो उसने देखा और भोगा है-पूरी सच्‍चाई और ईमानदारी के साथ। ... जीवन का अनुभव विचार को जन्‍म दे सकता है लेकिन विचार अनुभव को जन्‍म नहीं दे सकता। यहां विचार एक रूढि की तरह आता है और अनुभव विचार का पर्यायवाची हो जाता है। मतलब हर बार नये समय संदर्भों में अनुभवों के आधार पर विचारों का पुनरमूल्‍यांकन करने की जो हिम्‍मत करता है वही लेखक होता है वही प्रेमी होता है। और यह मूल्‍यांकन पूरी जटिलात और समय के विडंबना बोध को साथ लेकर चलता है वह विचारों का सरलीकरण नहीं करता।
जब लीडिया की पहली मुलाकात हुई थी तब वह पच्‍चीस की और एक बच्‍चे की मां थी , चेखव तब अटठाईस के थे और अविवाहित। लीडिया लिखती है- ... पर उस एक नजर में क्‍या कुछ नहीं था। ... उमंग,उल्‍लास और आनंद की जैसे हजार आतिशें जल उठीं।
जब चेखव को पता चला कि उनका एक बच्‍चा भी है तो उसकी आंखों में देखते उन्‍होंने पूछा- आपका बेटा भी है... अरे वाह ...।
लीडिया में लेखिका बनने की गहरी ईच्‍छा थी, जब उसकी शादी तय हुई तो मासिक रूसी विचार के संपादक गाल्‍तसेव ने कहा कि - बस फिर तो हो गया। अब भूल जाओ कि लेखिका-वेखिका बनोगी...। तब लीडिया ने संकल्‍प लिया कि वह शादी को लेखन में बाधा नहीं बनने देगी। पर बाद उसे लगा कि वह उसकी भूल थी कि विवाहित जीवन में लेखन के लिए समय ही नहीं था। पर यह चीज कहीं न कहीं उसके भीतर बैठी रही। शादी के बाद भी वह कहानियां लिखती रही छपवाती रही और अपने प्रिय लेखक चेखव या चेखान्‍ते को लेकर उसका प्रेम दस सालों तक बना रहा। अंतिम सालों में उसने चेखव की कहानियों के संकलन में उनकी काफी मदद भी की और उसकी लेखकीय जिद के रूप में हम इस खूबसूरत किताब को देख सकते हैं जिसमें चेखव से कुल आठ-दस मुलाकातों को जैसे पुनरजीवित कर दिया गया हो।
अपने भीतर के लेखक को बचाने की जिद में लीडिया ने अपने पति से तलाक की भी मांग की। तब वह पहले बच्‍चे की मां बनने वाली थी और चेखव से उसका परिचय भी नहीं हुआ था। पति ने समझाया कि यह गलतफहमी पर टिकी जिद है और लीडिया ने भी सोचा और पाया कि उसका पति उसके लिए कुछ भी उठा नहीं रखता, पर प्रेम के यह क्‍या मायने हुए कि एक दूसरे की तारीफ में गर्क होते रहें , प्रेम तो मिलकर बाकी दुनिया के लिए एक नयी राह तलाशना है , और लिखना उसी की ओर जाती एक राह है।
संतान हो जाने पर लीडिया के लिए तलाक की बात सोचना भी संभव ना रहा और उसने महसूस किया कि मेरे पंख कतर दिए गए हैं ...। यूं अब दोनों के बीच का तनाव घटने लगा था, लिखने को लेकर उसका पति उसे तंग करना बंद कर चुका था फिर भी लीदिया को समझ नहीं आ रहा कि इस उदासी और उब की वजह क्‍या है, जबकि उसकी कहानियां छपने लगी थीं।
पहली मुलाकात के तीन साल बाद चेखव से लीदिया की दूसरी मुलाकात हुई तब वह तीन बच्‍चों की मां बन चुकी थी। एक गोष्‍ठी में वह चेखव का इंतजार करती सोच रही थी कि - क्‍या उन्‍हें मेरी याद होगी, कि उस अनुभूति को जिसने तीन बरस पहले मेरे भीतर उजाला भर दिया था हम फिर जी सकेंगे...। यहां मीर याद आते हैं, उम्र भर एक मुलाकात चली आती है...। चेखव भी उस मुलाकात को उसी तरह याद रखे थे - वे बोले - तीन साल पहले जब हम मिले थे तो क्‍या तुम्‍हें ऐसा नहीं लगा था कि हमारा परिचय पहली बार हुआ हो, मगर हमारी जान पहचान पुरानी है और हमने एक लम्‍बे बिछोह के बाद एक दूसरे को पाया है ... कि यह अनुभूति इकतरफा हो ही नहीं सकती...।
उस मुलाकात के समय के संवादों को देखा जाए तो वे आम प्रेमियों के संवादों की तरह थे , रोमान और उत्‍तेजना और एक निष्‍कपट बाल सुलभ जिज्ञासा से भरे हुए।

मेरे 'सुखी पारिवारिक जीवन' में अब कोई रोशन दिन नहीं होगा
चेखव और लीडिया पहली मुलाकात के तीन साल बाद जब मिलते हैं वे तो बडे मजाकिया लहजे में बातें करते हैं। वे सोचते हैं कि उनका संबंध जरूर पूर्वजन्‍म का है और शायद वे पिछले जन्‍म में प्रेमी हों और एक साथ डूबकर मरे हों। हंसी की इन बातों के बाद चेखव उलाहना देते हैं कि कितनी बुरी हो तुम , जाकर कुछ भेजा नहीं , मैंने तुमसे कहानियां मांगी थी ...। अभी उनकी बातचीत आरंभ ही हुयी थी कि चेखव को उनके प्रशंसक ले गये। यहां मजेदार यह है कि आज कल की तरह उस काल में रूस में भी लेखकों के साथ अफवाह उडाने वालों का एक तबका भिडा रहता था, सो उनमें किसी ने उडा दिया कि पार्टी में चेखव ने नशे में धुत्‍त होकर कहा कि वे लीडिया के पति से उसे तलाक दिला कर शादी करने वाले हैं। यह सब सुनकर लीडिया की समझ में कुछ आ नहीं रहा था कि वह क्‍या करे ...। अंत में चेखव से लीडिया की भेंट हुयी तो चेखव ने कहा कि मुझे लेकर दुनिया भर के ऐसे ही अफवाह हैं - कि , मेरी शादी एक अमीरजादी से हुयी है, कि अपने मित्रों की पत्नियों से मेरे संबंध हैं वगैरह वगैरह...।
फिर चेखव ने लीडिया से विदा ली तो उदासमना लीडिया ने सोचा - मेरे सुखी पारिवारिक जीवन में अब कोई रौशन दिन नहीं होगा ...।
इस मुलाकात के बाद चेखव के साथ उनका पत्राचार चलने लगा। लीडिया चोरी छुपे डाकघर जाकर चेखव के पत्र लाती । कभी कभार एकाध पत्र वह अपने पति मिखाइल को दिखा देती थी। इस पर उसके पति ने कहा कि मेरी दिलचस्‍पी इसमें नहीं कि चेखव तुम्‍हें क्‍या लिखते हैं अगर दिखा सको तो तुम यह दिखाओं कि अपने पत्र में तुम उन्‍हें क्‍या लिखती हो। पर लीडिया ने कभी अपने पत्र चेखव को नहीं दिखाए।
कुछ दिनों बाद चेखव फिर पीटर्सबर्ग आए तो लीडिया उनसे मिली। तब चेखव ने उससे उसके बच्‍चों के बारे में पूछ - तो लीडिया ने बहुत उत्‍साह से उन्‍हें इस बारे में बताया।
बातचीत में लीडिया ने चेखव को सलाह दे डाली कि अब आपको शादी कर लेनी चाहिए। तो चेखव ने कहा कि मुझे इसकी फुर्सत कहां है, फिर उन्‍होंने लीडिया से सवाल किया कि .... क्‍या तुम सुखी हो ...
लीडिया को अब जवाब नहीं सूझ रहा था - वह बोली - मेरे पति बहुत भले हैं और बच्‍चे भी। पर किसी का भला लगना और सुखी होना दोनों में अंतर है ना ...मुझे लगता है जैसे मैं घिर गयी हूं ... मेरा कोई अस्तित्‍व नहीं रहेगा। क्‍या इसी का नाम सुख है ..।
इस पर चेखव ने उत्‍तेजना में परिवार और स्‍त्री की पराधीनता की आलोचना करते कहा कि अपनी प्रतिभा को पहचानो।
फिर बात बदल कर चेखव ने कहा - अगर मैंने शादी की होती तो मैं अपनी पत्‍नी से अलग रहने के लिए कहता ... ताकि ज्‍यादा से ज्‍यादा समय साथ बिताने से आपसी व्‍यवहार में जो असावधानी या अशिष्‍टता का पुट आ जाता है, वह हमारे बीच न आ पाए।
घर पहुंचने पर उनके पति ने दरवाजा खोलते हुए कहा कि तुम्‍हारे बिना हम सब अनाथ हो जाते हैं ...।
अपने घर में पति के पास लेटी लीडिया सोच रही थी कि उसे चेखव से प्‍यार है ... ।
जारी ...

Udan Tashtari ने कहा…
आभार इस आलेख के लिए. बहुत रोचक!!

August 28, 2008 5:38 AM
Nitish Raj ने कहा…
...पर इन्हें समझना इतना आसान भी नहीं...पर पढ़कर अच्छा लगा।

Thursday, November 6, 2008

दास्‍तोएवस्‍की के प्रेम - कुमार मुकुल

उपन्‍यास जगत की महान हस्‍ती और अपराध और दंड जैसी सार्वकालिक कृति के सर्जक दास्‍वोएवस्‍की के जीवन को हम देखें तो वह भी अपराध और दंड के जटिल संजाल में गुत्‍थम-गुत्‍था दिखेगा। रूप सिंह चंदेल की पुस्‍तक दास्‍तोएवस्‍की के प्रेम को पढते हुए यह साफ हो जाता है कि जीवनानुभव की जमीन पर ही महान रचनाओं का सृजन होता है। कि दास्‍तोएवस्‍की की मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि और दार्शनिक गहनता के श्रोत उनकी जीवन सलिला में ही हैं। पुस्‍तक के प्राक्‍कथन में ही रूपसिंह क‍हते हैं - ... उनका कोई भी कार्य शायद ही इतना चौंकानेवाला हो,जितना उनका स्‍वयं की जीवन... विशेष रूप से वेश्‍याओं,आदर्शवादी विवाहिता महिलाओं,आकर्षक और स्‍वतंत्र उन्‍मुक्‍त औरतों और कामुक युवतियों के साथ बिताया गया उनका जीवन था, यही नहीं जुआ उनकी विशेष कमजोरी थी।
पुस्‍तक में रूपसिंह ने उन परिस्थितियों को विश्‍लेषित करने का प्रयास किया है जिसकी उपज थे दास्‍तोएवस्‍की। उनकी तीन प्रेमकथाओं की चर्चा रही है, अपने प्रेम में वे बहुत क्रूर हो जाते थे,पाशविकता की हद तक। एक तरह का सनकीपन हमेशा उनके साथ रहा। और क्‍यों ना हो किशोर वय में वे अपने अपने भाई के साथ पागल हो जाने की योजना पर विचार करते थे।
उनके जीवन में जो अस्‍तव्‍यस्‍तता रही उसकी जड़ें उनके पालन पोषण के तरीकों से जुड़ी दिखती हैं। दास्‍तोएवस्‍की कभी भी अपने पिता के बारे में बातें करना पसंद नहीं करते थे। उनके चिकित्‍सक पिता कठोर अनुशासन पसंद और शंकालु स्‍वभाव के थे और अपनी पत्‍नी को बराबर प्र‍ताडि़त किया करते थे। पत्‍नी की मृत्‍यु के बाद उनके पिता ने नौकरी छोड़ दी और नौकरानी के साथ गांव जाकर रहने लगे,जहां ग्रामीणों व रिश्‍तेदारों ने उनकी हत्‍या कर दी।
प्रेम व्‍यवहार में पाशविकता की जड़ें हम उपरोक्‍त घटनाओं में तलाश सकते हैं। उनकी तीसरी पत्‍नी, जो उनके यहां टंकन के कार्य के लिए आई थीं और जिनके सामने उन्‍होंने प्रेम निवेदन किया तो वह भौंचक रह गयी थी पर आगे जिसे दास्‍तोएवस्‍की से प्रेम हो गया था, ने उन्‍हें संभाला। उनका नाम अन्‍ना था। दास्‍तोएवस्‍की ने जुआ में उसकी भी सारी चीजें गंवा दी थीं पर अन्‍न ने हिम्‍मत नहीं हारी। वह शायद भविष्‍य के इस लेखक को पहचान चुकी थीं और उसने जीवन भर और उसके बाद भी उनके मान-सम्‍मान की रक्षा में खुद को झोंक दिया। दास्‍तोएवस्‍की को उनकी लंपटता से मुक्‍त करने का श्रेय अन्‍ना को ही जाता है।
अन्‍ना ज‍ब दास्‍तोएवस्‍की के प्रेम में पड़ीं तो वे उसके पिता से भी ज्‍यादा उम्र के थे, पर अन्‍न का कहना था - लेकिन वे जवान थे,वह मेरे समय के युवकों से अधिक दिलचस्‍प और जीवंत थे ...। शादी के वक्‍त अन्‍न बीस की और दास्‍वोएवस्‍की पैंतालीस साल के थे। और मिरगी के वे पुराने मरीज थे। पर शायद अन्‍ना की पहचान सही थी, जिसने विश्‍व के इस महान रचनाकार को अपने स्‍नेह से संवारा। वह मानती थी कि - प्रेम करने में रूप-रंग,स्‍वास्‍थ्‍य और गरीबी बाधक नहीं होते।
दास्‍तोएवस्‍की की पहली पत्‍नी मारिया को उनसे प्रेम था या नहीं इस पर भी कई लोग शंका करते हैं, उनका मानना है कि वह उनपर दया करती थी व सहानुभूति दिखाती थी पर दास्‍तोएवस्‍की उसके दीवाने थे।
पहले परिचय में उनतीस वर्षीय मारिया इसाएव की पत्‍नी थी। इसाएव बीमार और शराबी था। दास्‍तोएवस्‍की उसके घर बराबर जाते थे। इसाएव उन्‍हें सम्‍मान से देखता था और दास्‍तोएवस्‍की उसके बेटे को पढाते थे। इसी दौरान उनकी मारिया से घंटों बातें होती थीं। आगे बीमारी और शराब की आदतों से इसाएव का असामयिक निधन हो गया। तब मारिया को पाने की व्‍याकुलता दास्‍तोएवस्‍की में चरम पर थी। पर मारिया उस समय एक अन्‍य स्‍वस्‍थ ग्रामीण युवक को चाहती थी। जिससे उसे एक पुत्र भी हुआ। बाद में दास्‍तोएवस्‍की की आर्थिक स्थिति सुधरी तो मारिया ने उनसे विवाह कर लिया। आगे मारिया भी बीमार रहने लगी और मर गयी।
मारिया के रहते ही दास्‍तोएवस्‍की को अपोलिनेरिया से प्रेम हो गया थ। पर यह भी असफल रहा। इसका श्रेय दास्‍तोएवस्‍की की यौन कुंठा को ही जाता है। प्रेम संबंधेां में वे यौन उन्‍मादी व परपीड़क सा व्‍यवहार करते थे व अपोलिनेरिया की अपनी महत्‍वाकांक्षाएं थीं।
पुस्‍तक को पढकर दास्‍तोएवस्‍की के जीवन के कई सकारात्‍मक पहलू भी समने आते हैं, जैसे कि वह रूस के पहले ऐसे लेखक थे जिन्‍होंने लेखन को जीवन का आधार बनाया था। वे लेखक के रूप में एक मजदूर की तरह निरंतर श्रम करते थे। यही कारण था कि उन्‍हें तुर्गनेव व तोस्‍तोय जैसे अभिजात वर्ग के लेखकों और नौकरशाह लेखकों से ईर्ष्‍या थी। तो अगर जुआ में धन उडाने की बीमारी उनमें थी तो लेखक के रूप में जी तोड़ मिहनत की सामर्थ्‍य भी।
यह आश्‍चर्यजनका था कि युवावस्‍था में क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण सश्रम कारावास भुगतने वाले दास्‍तोएवस्‍की की झुकाव धीरे-धीरे वामपंथ से दक्षिणपंथ की ओर होने लगा था और अंत में वे दक्षिणपंथी रह गए थे। जब रूस के राज्‍यतंत्रवादी लोग उग्र सुधारवादी व निरिश्‍वरवादी हो रहे थे दास्‍तोएवस्‍की राज्‍यतंत्रवादी व ईश्‍वर में आस्‍था रखने वाले होते जा रहे थे।
यह पुस्‍तक दास्‍तोएवस्‍की के जीवन को एक फिल्‍म की पटकथा की तरह सामने रख पाती है यह इसकी खूबी है।

Sunday, August 24, 2008

वेदों में क्‍या है - कुमार मुकुल



वेदों की आधारभूमि

स्पष्ट है कि खेतिहर समाज के लिए वर्षा प्राथमिक जरूरत है, इसी तरह बादलों से वर्षा कराने वाले इंद्र की पूजा भी स्वाभाविक है।
वेद आदिग्रंथ है। इसमें मांसाहारी समाज से विकसित हो, नए-नए बन रहे खेतिहर समाज के अनुभवों को ऋषियों ने अपनी ऋचाओं में अभिव्यक्त किया है। इन दोनों समाजों के बीच का टकराव वेद की आधारभूमि है। मांसाहार पर टिके पुराने मानुष समाज को नए खेतिहर समाज ने राक्षस की संज्ञा दी। खेतिहर समाज के ऋषि अहिंसा को अपनी ऋचाओं में प्राथमिकता देते दिखते हैं। इस विकास यात्रा में जो व्यक्ति या वस्तु उन्हें सहायक दिखते हैं। वे उसे देवता मान पूजा करते हैं। इन देवताओं में अग्नि-इंद्र से लेकर सोम, ओदन (भात) और मधु आदि सैकड़ों चीजें शामिल हैं। इन वेदों में आपको पूजा-प्रेम-घृणा-क्रूरता सभी भावों की अभिव्यक्तियां दिखती है।
चारों वेदों में ऋग्वेद को पहला और महत्‍वपूर्ण माना गया है। ऋग्वेद का आरम्भ मधुच्छन्दा ऋषि के अग्निदेव की अभ्यर्थना में लिखे गए श्लोकों से होती है। अग्नि को ही आरम्भ के लिए क्यों चुना गया इसका कारण इस श्लोक से हम समझ सकते हैं। इस ऋचा के अन्तिम श्लोक में लिखा गया है-हे अग्नि! पिता जैसे पुत्र के पास स्वयं ही पहुंच जाता है। वैसे ही तू हमको सुगमता से प्राप्त हो जाती है।
मतलब, विकास के क्रम में खेतिहर समाज को जो चीजें सहज उपलब्ध होती गईं और लाभकारी बनीं उन्हें देव पुकारा गयाअग्नि की विकास क्रम में महत्‍वपूर्ण जगह है। अग्नि की खोज ने खेतिहर समाज को मांसाहारी समाजों से आगे कर दिया। फिर यह अग्नि धीरे-धीरे सहज उपलब्ध होने लगी इसलिए इसकी अभ्यर्थना से ही ऋग्वेद का आरम्भ किया गया। वेदों में राक्षसों को अग्नि से डरने वाला बताया गया है। इससे भी जाहिर है कि अग्नि से राक्षसों का परिचय ठीक से नहीं था। विकास की कड़ी में वे पिछड़े रहे थे और खेतिहर समाज के कामों में भयवश अवरोध उत्पन्न करते थे।
अग्नि से भी ज्यादा वेदों में इन्द्र देवता की पूजा की गई है। इन्द्र को वर्षा का देवता कहा गया है। यहां भी स्पष्ट है कि खेतिहर समाज के लिए वर्षा प्राथमिक जरूरत है। इस तरह बादलों से वर्षा कराने वाले इन्द्र की समर्थक पूजा भी स्वाभाविक है। अधिकांश श्लोकों में इन्द्र से धन-धान्य-गौ की मांग की गई है। उस काल में गौ खेतिहरों के लिए मुख्य धन या गौ की ज्यादा संख्या से धनी होने का सम्बन्ध था। वर्षा से जहां फसलें होती थी, वहीं गाय को पर्याप्त चारा भी मिलता था। इसलिए इन्द्र से गौ की रक्षा की मांग की जाती थी। गौ से ही खेती के लिए बैल भी प्राप्त होते थे। इसलिए मांसाहारी समाजों से संघर्ष में गौरक्षा मुख्य विषय था। इसी सन्दर्भ में इन्द्र द्वारा वृत्रासुर-वध का प्रसंग आता है। वृत्र को राक्षस पुकारा गया है। जो जल को रोके हुए था। दरअसल वृत्र के मानी वहां बादल से भी है। जिसे तडित कराकर (बिजली गिराकर या वज्र गिराकर) इन्द्र बारिश कराते हैं। यूं आगे वृत्र ब्राह्मण भी कहा गया है, क्योंकि उसकी हत्या के बाद ब्रह्महत्या के भय से इन्द्र तालाब में छिप जाते हैं।
वैदिक काल में यज्ञ एक महत्‍वपूर्ण क्रिया-कलाप था। अधिकांश ऋचाओं में ऋषि देवों को अपना यज्ञ सफल बनाने के लिए आहवान करते दिखते हैं। यज्ञ भी खेतिहर समाज के लिए उस समय एक जरूरी क्रिया थी। खेतिहर समाज को खेती के लिए लगातार जमीन की जरूरत पड़ती थी, चूंकि उस समय चारों ओर जंगल थे, तो उसके लिए वनों काटना और जलाना पड़ता था। इससे नई जमीन हासिल होती थी। यही काम आगे यज्ञ के रूप में मान्य हो गई। यज्ञ में हवन के रूप में जंगल में लाई लकिड़यां जलती थी। उससे उठे धुएं से बारिश होती थी, जो खेतिहर समाज के लिए जरूरी था। यज्ञों को लेकर भी मांसाहारी पूर्वजों से खेतिहर समाज के लोगों का युद्ध होता था। चूंकि यज्ञ के नाम पर वनों के विनाश से उनकी आखेट भूमि नष्ट होती थी। इसीलिए वे यज्ञों को नष्ट करते थे। और राक्षस की संज्ञा पाते थे। वेदों में इस दृष्टिकोण से भी कुछ नया खोजने की जरूरत है।

ब्रह्म (अन्न) सत्यं, जगत मिथ्या ...


परस्पर सद्भावना, जीव मात्रा के प्रति प्रेम, सहिष्णुता आदि भारतीय लोकमानस के जो सकारात्मक पहलू हैं। उनकी जड़ें, वेदों में ही हैं। वेदों में धर्म और भाषा के विभेद नहीं है। अथर्ववेद के बारहवें कांड के पहले सूक्त में एक पंक्ति है : जनं बिभ्रती बहुध विवाचसं नानाधर्माणां पृथिवी यथौकसम। इसका अर्थ यह है कि अनेक धर्म और भाषा वाले मनुष्यों को पृथ्वी समान रूप से धारण करती है। यह जो वेदों की सहज समतामूलक दृष्टि है, उसे हम उदारता के रूप में व्याख्यायित करते हैं। पर सच्चाई यह है कि उदारता का दयाभाव इन पंक्तियों का आशय नहीं है, बल्कि यह एक सहजबोध है। एक सामाजिक अनुभव। क्योंकि उस समय धर्म का मतलब धर्मराज्य कायम करने से नहीं जुड़ा था, बल्कि धर्म तब आचरण और व्यवहार से जुड़ा था।
वेद ही नहीं ब्राह्मणग्रंथ, अरण्यक, उपनिषद् आदि में भी हमें तत्कालीन लोगों के सहज अनुभव ही प्राप्त होते हैं। गड़बड़ी तब होती है, जब हम उनकी पंक्तियों के अर्थ सन्दर्भ से काटकर प्रस्तुत करते हैं या उन्हें क्रमश: रूढ़ियों की तरह आज भी लागू करना चाहते हैं।
एक चितरंजन सवाल है कि सत्य क्या है। क्या वह चितरंजन भी होता है। तैत्तिरीय ब्राह्मण में सत्य के बारे में लिखा है। चक्षुर्वे सत्यम्, मतलब जो दिख रहा है, वही सत्य है। शतपथ ब्राह्मण में सत्य को देव और ब्रह्म कहा गया है। इसी में आगे कहा गया है कि अभय ही स्वर्ग है। अब यहा¡ सवाल उठता है कि अभय क्या हुआ? दरअसल अभय का सम्बन्ध दृष्टि से है। सत्य को देखनेवाली दृष्टि। यह दृष्टि विकसित हो जाने पर जब आप सत्य को उसके बहुआयामी स्वरूप में समझने लगते हैं तो जीवन को लेकर आपकी आशंकाए¡ कम होती हैं और आप निर्भय होते जाते हैं।
उपरोक्त सन्दर्भ में देखें तो किसी रहस्य के लिए कहा¡ जगह बचती है। बातें इतनी साफ हैं वहा¡ कि हमें किसी स्वामी या बापू की जरूरत नहीं है। इन्हें समझने के लिए अथर्ववेद में लिखा है : गातु वित्वा गातुमित। यानी मार्ग को जानो फिर चलो। यह नहीं है कहीं कि सत्य का दृष्टा मैं हू¡, पैगम्बर या मसीहा और आप सब मेरी राह पर चलें। अथर्ववेद में ही आठवें कांड के पहले सूक्त में कहा गया है कि पितरों की राह पर न चल (मानुगा: पितृन)। तो, लीक लीक गाड़ी चले, लीके चले कपूत, जैसे लोक में प्रचलित मुहावरों की जड़ें भी हम वेदों में पाते हैं। वेदों में हर जगह मन की, बुद्धि की ही महत्ता है। अपनी बुिद्ध को जो सही लगे उसी राह चलने की बात वहा¡ है। यजुर्वेद में है कि यह बुिद्ध ही सर्वोपरि है (इयमुपरि भति:) यही विश्वकर्ता है। एक जगह लिखा है कि मन रूपी गंधर्व ही प्रजापति और विश्वकर्मा है। आगे है कि प्रजापति (मन) ने असत्य में अश्रद्धा और सत्य में श्रद्धा को स्थापित किया।
अगर उपनिषदों को देखें तो वहा¡ और भी आगे की बातें हैं। इशावास्योपनिषद् में एक जगह कहा गया है, निरे भौतिकवादी अंधकार में जा पहुंचते हैं। अब हमारे बापू नाम केवलम् वाले यह पंक्ति पढ़कर लेगेंगे भौतिकवादियों को समझाने की देखो कैसी गर्हित बातें हैं परम्परा में, भौतिकवादियों के लिए। पर इसी श्लोक की अगली पंक्ति में लिखा है, निरे अधयात्मवादी उससे भी गहरे अंधकार में जा पहु¡चते हैं।
यहा¡ सवाल उठता है कि तब क्या किया जाए? भौतिकवाद, न अधयात्मवाद। तो फिर! यहा¡ निषेध नहीं है, बल्कि कहा गया है किोई भी वाद हो उसे आंख मूंदकर ना स्वीकारें जीवन के द्वंद्व को समझें। और अपने समय सन्दर्भ में उसकी व्याख्या करें।
अगर धयान से देखा जाए तो हमारे पुराग्रंथों में भौतिकवाद को कहीं भी अध्‍यात्म से कम नहीं आंका गया है। सामवेद में एक ऋचा में अन्न को ब्रह्म से भी पहले जन्मा बताया गया है। अरण्यक में लिखा गया है कि अन्न ही ब्रह्म है। अरण्यक के इसी अèयाय में आगे कहा गया है कि तप (कर्म) से ही ब्रह्म (अन्न) को पाया जा सकता है। अरण्यक के आठवें अध्‍याय की दूसरी कंडिका में कुछ पंक्तियां यूं हैं :

अन्नं ही भूतानां ज्येष्ठ्म तस्मात् सर्वेषध मुच्यते।
अन्नाद् भूतानि जायन्ते, जातान्येन्नेन वधनते।

मतलब जीवन-जगत् में अन्न ही श्रेष्ठ है। वह सभी रोगों की औषध है। अन्न से ही प्राणी पैदा होते हैं और अन्न से ही बढ़ते हैं। ऐतरेय ब्राह्मण में तो अन्न को विराट भी बताया गया है। (अन्नं वै विराट) उपरोक्त तथ्यों के प्रकाश में अगर अब हम कहें कि ब्रह्म (अन्न) सत्यं, जगत मिथ्या तो क्या अनर्थ होगा।

साधो, मन माने की बात

मन एवं मनुष्याणां मन यानी कि मानस ही मनुष्य है, एक प्रचलित उक्ति है। वेद भी मन की महत्ता से भरे हैं। आज भी मन की शक्ति से खुद को मुक्त नहीं कर पा रहा है कोई। सारे संयम मन से ही संचालित होते हैं। कबीर ने भी लिखा था : मन ना रंगाये रंगाये जोगी कपड़ा। पिछले वर्षों में भारत में ऐसे जोगियों की धूम मची रही। वेद-परम्परा आदि के नाम पर एड़ी-चोटी का पसीना एक करते रहे।
काश! उन्होंने वेदों को पढ़ने की जहमत उठाई होती तो उनहें एक-दूसरे के खून से अपने हाथ न रंगने पड़ते। मानो तो देव नहीं तो पत्थर यह लोकोक्ति वैदिक ही है। क्योंकि वहा¡ भी यही लचीलापन है। जिसके मन को जो भा रहा है, वही बात कर रहा है, कह रहा है। वहां कोई नियम नहीं है, मन को बांधने वाला।
यजुर्वेद में मन के बारे में ऋचा है : इयमुपरि मति:, मतलब यह जो मानस से उपजी बुिद्ध है। वही सर्वोपरि है। आगे की ऋचाओं में उसे विश्वकर्मा भी बताया गया है। प्रजापति विश्वकर्मा मनो गंèार्व: यानी मन रूपी गंधर्व ही प्रजापति ब्रह्म और विश्वकर्मा है।
दरअसल वेद के सारे कथन `मनमाने´ की बात हैं। वे प्रमाण हैं कि कैसे मानव मन का निरन्तर परिष्कार होता गया। उन्होंने वही लिखा, जो उनके मन को भाया। ऋग्वेद के पांचवें मंडल के सत्तरवें सूक्त में एक पंक्ति है-वय ते रुद्रा स्यामा। यानी हम भी दु:खहारी रुद्र हों। वहीं पहले मंडल के 164वें सूक्त में एक पंक्ति में इसी तरह कहा गया है कि हम सब भगवान हों।
माने आदमी-देवता और भगवान में कोई विशेष अन्तर नहीं था। वैदिक माल में वैदिक ऋषि देवता होने की कामना करते थे, देवता होते थे और जो उनके मन को भाता था उसे देवता पुकारते थे। यह सब मनोभाव के स्तर पर था, उसकी कोई मूर्ति नहीं थी। यजुर्वेद के बत्तीसवें सूक्त में एक पंक्ति है : न तस्य प्रतिमा ·अस्ति। यानी उस परमचैतन्य की मूर्ति नहीं बनाई जा सकती। ऐसा इसलिए था कि ईश्वर या देव एक मनोभाव था। अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग काल में उसके जुदा निहितार्थ थे।
देखा जाए तो वैदिक काल में मनुष्यों का मन भी तरह-तरह की कल्पनाएं करता है। जब वह सुबह को देखता है तो उल्ल्सित हो उठता है। और उषा की अर्चणा में ऋचाएं रचता है। रात से वह भी भय खाता है और उसे सर्वग्रासी बताता है। सोमपान के बाद उसका मन भी प्रमत्त हो जाता है और वह असंभव कल्पनाएं करने लगता है। जरा ऋग्वेद के दसवें मंडल के 119वें सूक्त की पंक्तियों के अर्थ देखें। उसमें कहा गया है : ``मैं पृथ्वी को जहां चाहूं उठाकर रख सकता हूं, क्योंकि मैं अनेक बार सोमपान कर चुका हूं।´´ या ``मेरा एक पक्ष स्वर्ग में स्थापित है तो दूसरा पृथ्वी पर। क्योंकि मैं अनेक बाद सोमपान कर चुका हूं।´´
मनोभावों को स्वच्छन्द ढंग से अभिव्यक्त करने की यह प्रवृत्ति मात्रा पुरुषों में ही नहीं है। स्त्रियां इसमें और भी आगे है। ऋग्वेद के अन्तिम मंडल के 159वें सूक्त में पंक्ति है-अहं के तुरहं मूर्धा इहा मुग्रा विवाचुनी। यानी मैं (गृहपत्नी) घर की, परिवार की ध्‍वजा हूं। मस्तक हूं।

वेद चर्चा - असुर नहीं, पूर्व देव

परम्परा में असुर देवता और असुर दोनों के पूर्वज हैं। उन्हें इसलिए पूर्वदेवा: भी पुकारा जाता है, संस्कृत में, असुर शब्द तो आधुनिक देवों के पूर्वदेवों (असुरों) से संघर्ष के बाद उनके लिए घृणा को प्रकट करने के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा। सभ्यताओं के संघर्ष में हमेशा आधुनिक ही जीतते हैं और वे अपने हारे हुए शत्रुओं को सभ्य ढंग से क्यों पुकारेंगे। अर्थववेद के पृथ्वीसूक्त में एक पंक्ति है : असुरानभ्यवर्तयन्। इसका अर्थ है-जिस पृथ्वी पर पुराने लोगों ने कई प्रकार के कार्य किए और जिस पर देवताओं ने `असुरों´ पर आक्रमण किए । ये पुराने लोग वे पूर्वदेव ही थे।
कुछ लोग परम्परा के नाम पर खुद को वेदों तक सीमित रखते हैं वे पूर्वदवों की कृतियों को भूल जाते हैं। जबकि जानकर वेदों के पूर्व के साहित्य को भी उतना ही महत्‍व देते हैं। पौराणिक हिन्दू धर्म के पहले से निगमागम नाम प्रसिद्ध है। निगम का माने वेद हुआ और आगम का मतलब प्राग्वैदिक वैदिकेतर परम्परा है। तुलसी दास ने भी निगमागम धर्म सम्मतं कहा है।
पूर्वदेवों को `अयज्ञा:´ `अनिंद्रा´ आदि भी पुकारा जाता था। अयज्ञा यानी यज्ञ प्रथा को न मानने वाले और अनिंद्रा मतलब इन्द्र को न माननेवाले। यज्ञ को मानने वाले उन्हें दास और दस्यु भी पुकारते थे। प्राग्वैदिकों के और भी कई नाम थे, जैसे-विद्याधर, नाग, यक्ष, राक्षस आदि।
यह कितनी मजेदार बात है कि असुर देवों के पूर्वज ही नहीं थे, वाकई उन्होंने देवों से पहले बहुत-सी अच्छी चीजें रची थीं। वहां सबकुछ बुरा नहीं था जैसा कि देवों ने उन्हें आगे साबित करने की कोशिश की। संभवत: वे सभ्य भी थे। भवन निर्माण की कला भी वे जानते थे। इन्द्र का एक नाम पुरंदर यानी पुरों (नगरों) को नष्ट करने वाला भी है। महाभारत में भी एक जगह मय असुर का जिक्र है जिसने पांडवों के लिए भवन निर्माण किया था।
दरअसल इस बारे में कुछ भी साफ-साफ नहीं कहा जा सकता। यह भी हो सकता है कि देवों ने दस्युओं को पराजित कर दास बना लिया उनसे तरह-तरह के काम कराया गया और स्वभावत: वे निपुण हो गए। यूं भी सारे कर्मकार और शिल्पकार तथाकथित सवर्ण जातियों के घेरे के बाहर पड़ते हैं। देखा जाए तो तथाकथित सारी सभ्यताओं का निर्माण दासों के शोषण से हुआ है।
अध्‍यात्म, दर्शन, ब्रह्मचर्य, आश्रम आदि की स्थापना भी देवों ने नहीं असुरों ने की थी। प्रह्लाद भी असुर थे उनके पुत्र कपिल ऋषि ने ही ये स्थापनाएं की थीं। यूं देव और असुर का बहुत साफ बंटवारा भी नहीं है। वैदिक देवों में एक देवता असुर भी है। फिर ऋषियों में एक कुत्स ऋषि हैं, यह शब्द कुत्सा से जुड़ा है।
ऋषि में सारी अच्छाइया¡ ही नहीं होती थीं। इस माने में ऋषि शब्द मुनि से बहुत दूर पड़ता है। जबकि हम दोनों का एक साथ उच्चारण करते हैं। ऋषि-मुनि। ऋषि वैदिक शब्द है। जबकि मुनि बौद्ध और जैन धर्म से जुड़ता है। ऋषि जहां मूलत: मांसाहारी हैं, वहीं मुनि अहिंसक। ऋषि वेद सुननेवाले शूद्र को कान में गर्म रांगा भरने की बात करते हैं। जबकि मुनि दलितों के हितैषी और बौद्ध-जैसे सन्त सम्प्रदायों के जन्मदाता। मुनि मूलत: प्राग्वैदिक (वेदों के पूर्व से) हैं।
परम्परा में शिवत्व की जो भावना है उसका भी श्रोत वैदिकेत्तर (वेद से पूर्व) है। वेदों में शिव की नहीं रुद्र की चर्चा है। वहां रुद्र अन्तरिक्ष के विनाशकारी देवता हैं। जबकि शिव का सम्बन्ध पूर्वदेवों से है। असुर गण (भूत-प्रेत-पिशाच) उनके सहज मित्र हैं। यक्ष और राक्षस भी उन्हें प्रिय हैं। अपने असुर गणों की सहायता से ही उन्होंने यक्ष प्रजापति का वैदिक यज्ञ विध्‍वंस किया था।
इसी तरह हनुमान, भैरव, शक्ति, गणेश आदि का सम्बन्ध भी शिव से है। वेदों में इनका स्थान नहीं है। कहीं जिक्र है भी तो गौण रूप में। वेदों में ग्राम है, पर नगर नहीं। वहीं पुराणों में नगर निर्माता असुर मय दानव की चर्चा है।
वेद शब्द का सम्बंध विद्या से है। विद्या जानने वालों से है। वेद चार ही हैं आज। यूं वेदत्रयी भी पुकारा जाता है। इसमें अथर्ववेद को छांट दिया जाता है। इसी तरह पहले धनुर्वेद, आयुर्वेद, गंधर्ववेद, सर्पवेद, पिशाचवेद, असुरवेद, आदि भी थे। जिन्हें बाद में भुला दिया गया है। देखा जाए तो असल में कर्मवेद वही थे, जबकि वेदत्रयी तो एक तरह से मनोवेद हैं। इसकी बातें भावनापरक और आकाशी ज्यादा हैं। जबकि बाकी वेद (विद्याएं) जीवन-जगत के ज्यादा काम की थीं। बाकी विद्याएं प्राग्वैदिक काल से ही चली आ रही थीं। प्राग्वैदिक देवों के अलग-अलग कामों से जुड़े उनके नाम थे, उनमें विविधता थी। जबकि वैदिक काल में एक मात्र मन की महत्ता को ही विविध रूप दे दिया गया। यजुर्वेद में एक श्लोक है, सूक्त 32 में-उसका अर्थ है कि अग्नि, वायु, आदित्य, प्रजापति, आदि एक ही देवता हैं। वे एक ही मूलतत्‍व की विभूतियां हैं।


स्त्रियों ने भी रची हैं वैदिक ऋचाएं

वेदों के पुनरपाठ की इस कड़ी में आप देखेंगे कि जिस स्त्री के वेद पढ़ने पर ही प्रतिबंध था, उसके कई हिस्सों की रचयिता वे खुद हैं।

वेदों को लेकर सबसे बड़ा वितंडा यह है कि यह अपौरुषेय है, ब्रह्मा की लकीर है, वेदों का अध्‍ययन करने पर यह भ्रम सबसे पहले दूर होता है। वेद की हर ऋचा को रचनेवाले ऋषि का नाम उसमें दर्ज है और ऋषि एक-दो नहीं पच्चीसों हैं, जिनमें दर्जनों नारियां है। अब कोई एक लेखक हो तो उसका नाम लिखा जाए वेद के लेखक के रूप में, बहुत सारे लेखक होने के कारण ही सबका नाम उनकी रचना के साथ दे दिया गया है।
वेद ब्रह्मा की लकीर भी नहीं हैं, इस बारे में तो हमारे पुराने शास्त्रों में ही कई कथन मिल जाएंगे। परशर-माध्‍वीय में कहा गया है-
श्रुतिश्च शौचमाचार: प्रतिकालं विमिध्‍यते।
नानाधर्मा: प्रावर्तन्ते मानवानां युगे युगे।।
मतलब, हर युग में मनुष्यों की श्रुति (वेद), आचार, धर्म आदि बदलते रहते हैं। अब सवाल उठेगा कि वेदों की तब क्या प्रासंगिकता है। जवाब में हम सिर ऊंचा कर कह सकते हैं कि वेद हमारे आदि पुरुषों-स्त्रियों के प्रथमानुभूत सुन्दर विचार हैं, पर वे अन्तिम विचार नहीं हैं। दरअसल, वेद उस समय की उपज हैं, जब विकास क्रम में लगातार नई-नई चीजों की खोज हो रही थी।
उनमें जो भी चीजें थीं, जो हमें कुछ देती थीं, वे आगे देवता कहलाने लगीं। ऐसा नहीं था कि केवल लाभदायक चीजें ही देवता कहलाईं। जो भय त्रास देती थीं, वे भी देवता कहलाई, जरा अपने कुछ प्रचलित वैदिक देवताओं के नाम देखें-जंगल, असुर, पशु, अप्सरा, बाघ, बैल, गर्भ, खांसी, योनि, पत्थर, दु:स्वप्न, यक्ष्मा (टीवी), हिरण, भात, पीपल आदि।
अब कुछ अप्रचलित ऋषियों के नाम देखें जिन्होंने वैदिक ऋचाए रचीं-मानव, राम, नर, कुत्स, सुतम्भरा, अपाला, सूर्या सावित्री, श्रद्धा कामायनी, यमी, शची पौलमी, ऊर्वशी आदि। वेदों की रचना में स्त्रियों की महत्‍वपूर्ण भूमिका है, यह उपरोक्त स्त्री ऋषियों की ऋचाओं को पढ़कर जाना जा सकता है।
मजेदार बात यह है कि स्त्री ऋषियों ने कई ऐसी ऋचाएं रची हैं जिनमें उन्होंने खुद को ही सर्वशक्तिमान कहा है।
कहीं यह स्त्रियों की मजबूत स्थिति ही तो नहीं है कि आगे षड्यंत्रकारी पुरुष वैदिक भाष्यकारों ने उनको वेद पढ़ने की ही मनाही कर दी, जिसकी आज तक वकालत की जाती है। जो स्त्रियां¡ खुद वेद रच सकती हैं, उन्हें उनका पाठ करने से कोई कैसे रोक सकता है? वेद को पढ़ें, तो वे अपने समय की सहज रचना मालूम पड़ती हैं। बातें वहां बड़ी सीधी हैं। उनको समझने के लिए किसी प्रकाण्डता की जरूरत नहीं है, जरूरत उनकी अनुवाद के साथ उपलब्धता की है।
वेदों में प्रकृति को लेकर सहज उल्लास है, प्रकृति आज भी हमें उसी तरह उल्ल्सित करती है। वहां छोटी-छोटी कामनाओं के लिए आदमी इन्द्र से याचना करता है। आज तक वह याचक कृति हमारे लिए अभिशाप बनी चली आ रही है। छोटे-छोटे डरों से भयाक्रान्त वैदिक मनुष्य ऋचाओं में उन्हें देवता पुकारता, उनसे मुक्ति की मांग करता है।
वह विकास का आरिम्भक दौर था और जानने की प्रक्रिया में यह एक सहज क्रिया थी, विशिष्ट नहीं। जैसे ऋग्वेद के दसवें खंड के 184 वें सूक्त में ऋषि त्वष्टा लिंगोक्ता : देव से प्रार्थना करते हैं-विष्णुयोनि कल्पयतु, त्वष्टा रुपाणि पिंशतु। मतलब, देवता इस स्त्री को प्रजनन योग्य बनावें। आज इस काम के लिए लोग डॉक्टर के पास जाते हैं।
क्या उन्हें आज भी किसी ऋषि की खोज करनी चाहिए? इसी तरह सूक्त 165 में कहा गया है, `इस अमंगलकारी कबूतर को हम पूजते हैं। हे विश्वदेव, इसे यहां से दूर करें।´ क्या आज भी हमें कबूतर को अशुभ मान उनसे डरना चाहिए। आज कबूतर हमारे मिन्दरों में छाए रहते हैं और कोई उन्हें अशुभ नहीं मानता है। मतलब वेदों में सारा अटल ब्रह्मवाक्य ही नहीं है।

सबसे बड़े वैदिक देवता भात ( ओदनम् )

वृहस्‍पति मस्‍तक है भात का

अश्‍व इसके कण हैं

गायें हैं चावल के दाने
और मच्‍छर हैं फोंतरे
घोंघे हैं इसके उूपर के छिलके
बादल इसका चारा है
काला लोहा है इसका मांस
और रूधिक है तांबा
जस्‍ता इसकी राख
हरित है इसका रंग
और नीलकमल है
इसकी गंध

यह धरती मिटटी का वर्तन है
इसमें पकता है भात
आकाश ढक्‍कन होता है
हल की फाल पसलियां हैं इसकी
मिटटी है इसका मल

ऋतुएं रसोइनें हैं इसकी
दिन और रात समिधाएं हैं
पांच मुख वाले चरू को
पका रहा घाम
इस भात को अर्पित कर
जो कर रहा है यज्ञ
सारे लोक
उसे प्राप्‍त होते हैं।
( वरिष्‍ठ कवि विजेन्‍द्र के संपादन में निकल रही लघु पत्रिका कृति ओर के जुलाई-सितंबर 2007 अंक में राधावल्‍लभ त्रिपाठी द्वारा अनुदित अर्थववेद से लिया गया अंश )

वेदों में क्‍या है

वेद देव स्‍तुति से भरे हैं। देवता माने जो देता है। सुर जो सुरा का सेवन करते हैं असुर जो नहीं करते। वेदों में सर्वाधिक प्रार्थना इंद्र की हुई है। पर इसका मतलब यह नहीं कि इंद्र सबसे महत्‍वपूर्ण देवता हैं। इंद्र के बाद सबसे ज्‍यादा मंत्र अग्नि पर है। ऋग्‍वेद का आरंभ अग्नि पर लिखी ऋचा से होता है। यह सम्‍मान इंद्र को नहीं मिला है। दरअसल किस पर कितनी ऋचा है इससे ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण यह है कि उसमें क्‍या लिखा है। इंद्र पर लिखी गईं अधिकांश ऋचाएं धन-धान्‍य के लोभ में लिखी गई हैं। यजुर्वेद के तीसरे अध्‍याय में लिखा गया है कि हे सैकडों कर्मो वाले इंद्र , हमारे और तुम्‍हारे मध्‍य परस्‍पर क्रय-विक्रय जैसा व्‍यवहार संपन्‍न हो। अर्थात मुझे हर्विअन्‍न का फल मिलता रहे। हे इंद्र मूल्‍य लेकर क्रय योग्‍य फल मुझे दो। फिर उन ऋचाओं में इंद्र को सर्वश्रेष्‍ठ भी नहीं बताया गया है। अथर्ववेद में भात यानि चावल को देव मानकर कई ऋचाएं हैं। उनमें भात को जो सम्‍मान मिला है वह इंद्र के लिए लिखी गई सैकडों ऋचाओं में नहीं है।
भात को न केवल त्रिदेवों का कारक बताया गया है बल्कि उसे काल का भी जन्‍मदाता माना गया है। इसी तरह उच्छिष्‍ट यानि जूठन-मधु की प्रशंसा में जो लिखा गया है उनमें भी मधु की इंद्र से अच्‍छी स्‍तुति है। इसी तरह रूद्र को भी जो महत्‍व दिया गया है यजुर्वेद में वह इंद्र से कम नहीं है। एक श्‍लोक में लिखा गया है- हे रूद्र आपके नेत्रों में तीनों लोक प्रकाशित हैं। आपको अन्‍य देवताओं से अलग और उत्‍कृष्‍ट जानकर हम आपको यज्ञ का भाग देते हैं। रूद्र को चिकित्‍सक के रूप में महत्‍व देते हुए कहा गया है कि - तुम सर्वरोगनाशक औषधि प्रदान करो और हमें जन्‍म-मरण के चक्र से मुक्‍त करो।
ऐसा नहीं था कि वैदिक ऋषि केवल देवों और त्रिदेवों को ही पूजते थे। वे भात, मधु, पत्‍थर, आदि के साथ यजमान को भी पूजते थे। अपनी प्रशस्ति गाने में भी वे पीछे नहीं रहते थे। बहुत से ऋषियों ने खुद पर ही ऋचाएं लिखी हैं। जैसे अथर्व वेद में अथर्वा खुद की अभ्‍यर्थना करते हुए अपने को देवताओं से भी बडा दिखाते हैं।
यजुर्वेद के तीसरे श्‍लोक में यजमान के लिए ऋषि लिखते हैं- हे यजमान, यश के निमित्‍त अन्‍न और अपरिमित धन व बल पाने के लिए मैं तुझे पूजता हूं। इस तरह वेद देवों-मनुष्‍यों-ऋषियों के भौतिकवादी व्‍यवहार को ज्‍यादा उजागर करते हैं आध्‍यात्कि व्‍यवहार को कम।

टिप्‍पणियां-

deepanjali ने कहा…
आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा.
ऎसेही लिखेते रहिये.
क्यों न आप अपना ब्लोग ब्लोगअड्डा में शामिल कर के अपने विचार ऒंर लोगों तक पहुंचाते.
जो हमे अच्छा लगे.
वो सबको पता चले.
ऎसा छोटासा प्रयास है.
हमारे इस प्रयास में.
आप भी शामिल हो जाइयॆ.
एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.
September 25, 2007 1:48 AM

अतुल ने कहा…
वेदों और उपनिषदों में स्त्रियों की बडी भूमिका रही है, जिसपर ब्राह्मण और पुराण काल से रोक लगने लगी, जब देश में बड़े-बडे सामंती चरित्र के साम्राज्य स्थापित होने लगे.
April 14, 2008 8:07 AM

देव प्रकाश चौधरी ने कहा…
रोचक लेख....जानकारी काम की है। शुक्रिया
April 14, 2008 8:09 AM

विजयशंकर चतुर्वेदी ने कहा…
आप अच्छा लिख रहे हैं. कृपया जारी रखें!
May 19, 2008 5:42 AM

अतुल ने कहा…
फ़ारसी में अहुर देव ही हैं. वेद में भी थे पर बाद में सुर के विरोधी माने जाने लगे. अवेस्ता में भी चर्चा है.
April 15, 2008 9:05 AM

Udan Tashtari ने कहा…
आभार इस आलेख के लिए.
August 13, 2008 7:36 AM

अभय तिवारी ने कहा…
पूरा लेख बेहतरीन बन पड़ा है..सिवाय एक बात के.. आप ने देवता माने देने वाला बताया है.. जबकि देवता की उत्पत्ति द्युत धातु से है.. द्युत माने चमकना.. इस द्युत से ही द्युति, द्यूत, दिवस, दिव्य, देव , देवता, द्योतक आदि शब्द बने हैं.. तो देवता का अर्थ चमकने वाली शक्ति के अर्थ में बनेगा..
आशा है आप अन्यथा न लेंगे और अपना अमूल्य काम निर्बाध जारी रखेंगे..
August 16, 2008 6:40 AM

हकीम जी ने कहा…
Veda is a body of religious and philosophical beliefs and cultural practices native to India and based on a caste system; casteism is not poisonous, its the most wonderful social ordering of people based on their individual skills (work)
Discrimination based on the work u do, is the inhuman and poisonous thing..
Even today people all over the world discriminate others based on the work they do, their earnings, their type of life, money, their knowledge, their religion, their race, their skin color etc., and what no...
more progressed humans(in some way) have always been discriminating less progressed humans, this should stop through out the world, you cannot blame india, hindus and casteism for this.
It is false to say caste and skin color are related, they are darker brahmins and there are whiter lower caste people..
In ancient India...In every village there used to be atleast one family belonging to each of the caste(means people belonging to working groups like merchants, teachers, labourers, leader), and only if each mingle with each other.. and work for each other...every one in the village will be happy..
So in every function(ie either temple, marriage or any social function)every caste(family) in the village used to take part...
and every caste used to contribute to the function....
it was a custom that every caste profit from that function and grow.(for eg in marriage-the brahmins do the mantra part, the vaisyas take care of all the business & agri part of the function, the sudras, does the shaving, haricut and other help for smooth functioning of the marriage,kshtriya takes care and looks to that no untoward incident happens in the function )
it is because people started discriminating people based on the work they do and failed to do their duty that india such a rich country once, is now in this condition.
Brahmins failed to do their teaching and spiritual duty, thats why the lack of sprituality in people, no one knows what vedas and gita is..and some western religion is converting people and explaining spirituality to a highly spiritual india.
Vaisyas failed to do their duty that why the economy went down..
the kshatriyas did not do their duty thats why islamic, protugese and british people from west invaded us and looted all treasures (both intellectual and material) what we had.
All now in india are sudras, working in front of computers for some alien country or doing jobs for others..i'm happy to be a sudra and work for others, but all other caste have not done their duty and thats why india is alien for indians them selves...
you can see intercaste marriages in mahabharatha ramayana etc.,
its false to say that no one was allowed to inter marry

Monday, August 18, 2008

स्त्रियां पिकासो की - कुमार मुकुल


सिद्ध मनोविज्ञानी कार्ल युंग ने अपने एक लेख में पिकासो और उसकी कला को ि‍स्कजोफ्रेनिक कहा था। पिकासो के जीवन में और उसके चित्रों में आई दर्जन भर से ज्यादा स्त्रियों के साथ उसके व्यवहार को अगर देखा जाए तो युंग की बात सही लगती है। पर कलाकार यही तो करता है कि अपनी कमियों को एक चेहरा दे देता है जिससे वह खुद उसे पहचान पाता है उससे लड़ता है और इस तरह खुद को बचा लेता है। शायद पिकासो ने भी ऐसा ही किया। उसके जीवन में छह घोषित प्रेमिकाएं थीं जिनमें से दो से उसने विवाह किया था। उसके लंबे जीवन में अक्सर एक साथ दो या तीन प्रेमिकाएं रहती थीं। यहां तक कि वह उनके आने जाने के लिए कई दरवाजे रखता था और किसे किस दरवाजे से आना है यह भी तय करता था। इसके लिए एक मित्रा को वह हमेशा मुस्तैद रखता था।
उसके जीवन में आने वाली स्त्रियों में फ्रांसुआज, ओलिविए, ओल्गा, मारी तेरेज, डोरा मार, जैकलिन प्रमुख थीं। बेल फर्नांद, मादलेन, स्टाइन, नुश, इव्वा, युजेनिया आदि उसकी अन्य सहचरियां थीं। यह सब असामान्य नहीं था। नब्बे साल का लंबा जीवन जिया था पिकासो ने। और वह चित्रों के लिए मॉडलों का प्रयोग नहीं करता था। जीवन में आई स्त्रियों को ही वह मॉडल के रूप में प्रयोग करता था, या यूं कहें कि मॉडल के रूप में आई स्त्रियों के साथ वह टिककर रहने लगता था। चाहे वह वेश्या हो या किसी की पत्नी या उसके नाम से प्रभावित हो उसे देखने को उसके आस-पास मंडरती लड़कियां।
कुल मिलाकर अपनी प्रेमिकाओं के साथ उसका व्यवहार न्यायसंगत नहीं था। वह उनसे प्रेम नहीं करता था। और किसी स्त्री द्वारा छोड़ जाना उसे बर्दाशत नहीं होता था उसे वह किसी भी तरह अपने से बांèो रखना चाहता था। चित्रों में भी वह अधिकांश तौर पर उन्हें विकृत तौर पर चित्रित करता था। यूं कई सहज, सुंदर चित्र भी बनाए उसने। फर्ंनाद पिकासो की पहली जीवन सहचरी थी। वह पिकासो के जीवन का दरिद्रता का दौर था। सबमें उसने उसका साथ दिया। माधुरी पुरंदरे लिखती हैं - पाब्लो बड़ा शक्की था। कला और स्त्री दोनों के बारे में उसकी जिद विजेता होने की थी। मेरी स्त्री मुझे छोड़कर चली न जाए यह डर उसे हमेशा छेदता रहता था। फर्नांद को तो वह अकेले घर से बाहर नहीं ही जाने देता था, बाहर जाते
समय उसको कमरे में तालाबंद कर जाता था।
ये और ऐसी तमाम हरकतों के मूल में पिकासो के युवा काल की एक घटना के उसके मन पर पडे़ प्रभाव को देखा जा सकता है। वह थी उसके एक मित्रा काजागमास द्वारा प्यार में की गयी आत्महत्या। काजागमास ने नोंकझोंक में अपनी प्रेमिका जर्मेन पर गोली चला दी थी और उसे मरा समझ कर खुद को गोली मार लिया था। इसका उस पर गहरा असर पड़ा। उसने इसे कला में ढाल दिया। उससे संबंधित कई चित्र बनाये उसने। और जैसे खुद को चेतावनी दी कि इस तरह की मौत नहीं मरनी। फिर पिकासो की पहली प्रेमिका फनाद उसे छोड़कर किसी दूसरे चित्रकार के साथ घर छोड़कर चली गयी थी। इस तरह उसका शक्की व्यवहार और फिर उससे पैदा हुई इस तरह की परिणतियों ने उसे स्त्री के मामले में कठोर बना दिया। पिकासो नियमित वेश्याघरों को जाता था और वहां के जीवन का भी उस पर असर पड़ा। वहां उसने मात्र शारीरिक प्रेम को पाया और पैसे के व्यापार को। वह सोचता कि निष्कलुष प्रेम कैसे टिक सकता है। फिर चौदह साल की उम्र में ही जिस तरह उसने काम भावना प्रधान जीवन आरंभ किया था वह अंत तक चलता रहा। इस तरह प्रेम हमेशा उसे एक विभ्रम में डालता था। वह उसका उपयोग कला में खुद को निखारने में करता था। उसकी सृजन शक्ति का आधार वही था पर अपने इस आधार पर ही वह बराबर चोट करता था। उसके जीवन में आई हर स्त्राी ने उसकी कला को एक नया मुकाम दिया और सबातेज के हिसाब से उसके कला के हर कालखंड से जुड़ी स्त्रियों का नाम उसके काम के साथ जोड़ा जाना चाहिए। विध्‍वंस और सृजन जैसे एक साथ उसकी कला में चलते रहते थे। जिनसे वह प्रेम करता उन्हें ही रूलाता और फिर उस रुदन को भी चित्रिात करता। पिकासो के अनुसार चित्रकला विध्‍वंस का कुलजमा योग होती है।
एक मनमौजीपन पिकासो में हमेशा रहा। मनोवैज्ञानिक मेडेल के अनुसार उसमें अमानवीय सा कुछ नहीं है उसने स्वध्‍याय तो काफी किया पर दिशाहीन। यह दिशाहीनता हमेशा उसके बात-व्यवहार में देखी जा सकती है। वह हमेशा अपने साथ एक रिवाल्वर रखता था। और आरंभ के दिनों में रात में जब तब फायर कर लोगों को चौंकाता था।
उसके जीवन में आयी स्त्रियों का पता लोगों को उसके चित्रों से लगता था। फिर उसकी नायिका उसके जीवन में अवतरित होती थी। जैसे ही किसी नयी नायिका का प्रवेश होता पुरानी उसके कैनवस से गायब होने लगती और जीवन से भी वह किनारे कर दी जाती। पिकासो की बनायी अिधकांश नंगी स्त्रियां कुरूप और राक्षसी-सी हैं। कभी उसने स्टाइन को कहा भी था कि प्रत्येक कला कुरूपता की घुट्टी पीकर ही जन्मती है।
पिकासो की मित्र स्टाइन पता लगा पाती कि उसके कैनवस की नयी नायिका कौन है तब तक इव्वा का उसके जीवन में पदार्पण हो चुका था। इव्वा के साथ उसका जीवन सुंदर और सामान्य रहा। उसके आने से पिकासो बहुत खुश हुआ उसने रहने की जगह बदली और प्रेम से इव्वा के साथ रहने लगा। हर महत्‍वपूर्ण घटना के बाद पिकासो रहने की जगह बदल लेता था। बाद में इव्वा बीमारी से मर गई और पिकासो बहुत दुखी हुआ।
विकृत व्यवहार के बाद भी स्त्रियां और सफलताएं हमेशा उसके साथ रहीं। हालांकि सफलता को वह खतरनाक मानता था पर अपनी अनदेखी उससे कभी बर्दास्त नहीं हुई। इव्वा के बाद उसके कैनवास पर आने वाली स्त्री थी युजेनिया। युजेनिया पिकासो की पुरानी मित्र स्टाइन को पिकासो से दूर करने में सफल हुई। इस दौरान पाकरेत और इरेन भी पिकासो की छाया के पीछे मडराती रहीं। पर अब पिकासो के जीवन में पहली ऐसी नायिका का प्रवेश होने वाला था जिसे उसकी पहली पत्नी का दर्जा मिलना था। वह थी ओल्गा। वह एक रूसी वैले में नर्तकी थी। वैले के लिए काम करते उससे प्रगाढ़ता हुई थी पिकासो की। पर इस बार उसके मित्र दियाघिलेव ने उसे चेतावनी दे दी थी कि रूसी लड़की के साथ विवाह करना पड़ता है। ओल्गा से उसने विवाह किया और फरवरी 1921 में उसे एक पुत्रा हुआ पावलो। अब मातृत्व उसके चित्र का विषय हो चुका था। पिकासो का कहना था कि जैसे लोग आत्मकथा लिखते हैं वैसे ही मैं चित्र बनाता हूं।
बाद में ओल्गा के साथ पाब्लो का जीवन कष्टकर होता गया। अब उसके चित्रों में पहले सुंदरता का पर्याय बनी ओल्गा अब विकृत चेहरों के साथ आने लगी। एक कवि ब्रतों ने उसके बारे में कहा भी था - कि किसी चित्रकार ने स्त्री से इतना प्रेम नहीं किया होगा और उसकी इतनी अवहेलना भी नहीं की होगी। पाल एलुआर के अनुसार - वह असामान्य उत्कट प्रेम करता है और जिस बात से प्रेम करता है, उसी की हत्या भी कर देता है। पिकासो का खुद के बारे में कथन भी था - मेरे कहने पर यकीन मत करते जाना।
मजेदार बात यह है कि पिकासो की मां की राय भी पिकासो के बारे में कुछ अच्छी नहीं थी। जब ओल्गा से उसका विवाह होने
वाला था तो पिकासो की मां ने ओल्गा से कहा था कि - मेरे बेटे के साथ कोई भी स्त्री सुखी हो सकती है इस पर मुझे यकीन नहीं। वह सिर्फ अपने लिए है दूसरे के लिए नहीं।Þ पिकासो से प्रेम करने वाली अिधकांश स्त्रियां धनी, अभिजात घराने से थीं वे उसे बहुत कुछ देने को तत्पर रहती थीं पर पिकासो केवल उस स्त्री को चुनता था। जब ओल्गा के साथ पिकासो की कलह होने लगी तो उसने मारी तेरेज को ढूंढ़ निकाला। मारी उसे बाजार में मिली थी और पिकासो को जंच गई थी उसने सीधे उसके कंधे पर हाथ रख कहा - तुम्हारा चेहरा खूबसूरत है, मुझे तुम्हारा चित्र बनाना अच्छा लगेगा। फिर छह महीने तक पिकासो उसके पीछे पड़ा रहा और अंत में मारी उसकी हो गई। पिकासो ने ओल्गा को तलाक देना चाहा पर वह तैयार नहीं हुई। उससे छिपाकर पिकासो मारी के साथ रहता रहा। मारी के साथ वह सबसे ज्यादा रहा पर ज्यादातर छिपा कर। जब पिकासो ने मारी के सामने उसका चित्र बनाने का प्रस्ताव सड़क पर पहली बार रखा था तब भी वह पिकासो के बारे में कुछ नहीं जानती थी, बाद में भी मारी ने उसके चित्रों के बारे में कहा - मुझे पिकासो के चित्रों में कुछ खास मालूम नहीं पड़ता। 1935 में मारी से पिकासो को एक पुत्र हुआ जिसका नाम पिकासो ने माया रखा। मारी ओल्गा से तलाक का इंतजार करती रही पर अंत तक वह नहीं हुआ।
मारी के बाद पिकासो के जीवन में फ्रांसुआज जिले का प्रवेश हुआ । उसकी प्रेमिकाओं में मात्र उसी ने पिकासो के खिलाफ आगे मोर्चा खोला और अंत तक लड़ती रही। जिले ने आहत हो उसके बारे में लिखा था - जिस प्रकार शिकारी अपने शिकार का सिर दीवानखाने में टांग देता है, वैसे ही पिकासो अपनी स्त्रिायों के सिर रख देता है। हां वे धड़ से पूरी तरह अलग नहीं हो पाते। उनमें थोड़ी जान देने का इंतजाम वह कर देता है।
यूं अपने चित्रों में वह स्त्राी के खिलाफ होने वाले अत्याचारों पर भी जमकर कूची चलाता। 1933 के बाद उसके चित्राों में स्त्रियों पर जुल्म ढाते राक्षसी चाल चलने वाले सैनिक दिखाई पड़ने लगे। इस संदर्भ में पिकासो के कथन को ही देखा जाना चाहिए, वह कहता था - ßचित्राकला मुझसे शक्तिशाली है, वह जो चाहती है मुझसे करा लेती है। मैं कुछ बोलता नहीं पूरा, रंग देता हूं। मैं उस स्थिति तक पहुंचना चाहता हूं जहां कोई यह जानने का प्रयास नहीं करेगा कि मैंने अपना चित्र कैसे बनाया। इसकी क्या जरूरत है। मैं चाहता हूं कि अपने चित्रों को भावनाओं से मुक्त कर सकूं।Þ साफ है कि वह अपनी रचना प्रक्रिया को बाहर लाने से सप्रयास बचता था। इसके लिए ही वह परस्पर विरोधाभासी बयानेां का सहारा लेता था।
पिकासो बहुआयामी प्रतिभा का था । चित्र बनाने के अलावे कविता, नाटक आदि भी लिखता। इससे उसकी मित्र स्टाइन नाराज होती कि वह उसके क्षेत्र में दखल दे रहा है। इस पर चिढ़ कर पिकासो कहता - ßतुम हमेशा मेरे बारे में कहती हो कि मैं एक असामान्य व्यक्ति हूं। फिर असामान्य मनुष्य जो चाहता है, वह कर सकता है।Þ इस पर स्टाइन चीखती - ßतुम असामान्य हो यही तुम्हारी सीमा है मुझसे यह मत कहलवाना कि वह काव्य हैÞ यूं पिकासो का विश्वास कलाओं के परस्पर सामंजस्य में था। वह सोचता कि चित्र लिखा जाए और कविता उकेरी जाए। पिकासो की कविता के बारे में ब्रेतों ने कहा था - ßयह उतनी ही दृश्यात्मक है, जितना काव्यात्मक उसका चित्र।Þ आगे उन कविताओं ने उसे महान कवि पाल एलुआर का चित्र बनाया।
मारी तेरेज के बाद पिकासो के जीवन में आने वाली स्त्राी थी डोरा मार। वह मारी के विपरीत पिकासो की आंखों में आंखें डाल बाते कर पाती थी। डोरा पिकासो को एक कैफे में मिली थी और पहली ही मुलाकात में टेबल पर पडे़ चाकुओं को फेंकने का खेल करते अपने हाथों से खून निकाल लिया था उसने। और यह लाल रंग पिकासो की आंखों में बैठा तो फिर वह डोरा का हो गया। डोरा वामपंथी विचारों की थी और वामपंथी विचारों के कवि एलुवार की मित्र भी थी। डोरा और एलुआर के प्रभाव में ही पिकासो का खिंचाव वाम धारा की ओर हुआ था और बाद में लंबे समय तक पिकासो वामपंथी दल का सदस्य रहा था।
अपनी प्रेमिकाओं को उल्लू बनाने के उसके अपने नुस्खे थे। जैसे अपने प्रसिद्ध चित्र गुएिर्नका को दिखाते उसने मारी तेरेज को कहा कि चलो यह चित्र तेरा है। अगले ही क्षण ऐसे तात्कालिक बयानों से वह पलट जाता। यहां तक कि ओल्गा से वह तलाक इसलिए नहीं चाहता था कि इसके चलते उसे अपने चित्रों का भी बंटवारा करना पड़ेगा। पेरिस में लंबा समय बिताने वाला पिकासो स्पेन का था और स्त्रियों के प्रति उसके व्यवहार को लोग स्पेन के पारंपरिक स्त्री विरोधी आचरण से जोड़ कर देखते थे। उसकी ख्याति से खिंची औरतें उसकी ओर भागती चली आतीं और वह उन्हें अपने चारों ओर घुमाता रहता। इस तरह साठ साल की उम्र में पिकासो बीस साल के जोश से काम करता ओर वैसी ही बुभुक्षा को कायम किए रहता। उसकी प्रसिद्धी ऐसी थी कि लोग पेरिस में एफिल टावर के साथ पिकासो को देखने आते। पिकासो के चित्रों में स्त्रिायां अिधकतर बंद कमरों में दिखती हैं, भयानक पागलों जैसी कैदी स्त्रियां। यहां याद कीजिए पिकासो की पहली प्रेमिका से उसका व्यवहार, जिसे वह घर में ताला बंद कर बाहर जाता था। अथाह पैसा होने के बाद भी पिकासो कंजूस था। आने वाली लड़कियों के चित्र बना कर वह उन्हें दे देता। एक बार एक लड़की की नग्न तस्वीर बना उसने उसे भेंट किया। अब लड़की उस चित्र का क्या करती। उसे उसकी कीमत पता थी सो उसने उसे छुपा कर रख दिया। उसकी शादी हुई फिर तलाक हुआ तब उसने उस चित्र को बेचना चाहा तो उस पर पिकासो के हस्ताक्षर नहीं थे उसने पिकासो से उस पर हस्ताक्षर कराने चाहे तो उसने उसे अपना चित्र मानने से इनकार कर दिया।
इधर उसकी उपेक्षा से डोरामार भी मानसिक तौर पर अवसाद ग्रस्त रहने लगी। उम्र के छियासठवें साल में पिकासो को फ्रांसुआज से एक पुत्र की प्राप्ति हुई। उसकी कनूनी पत्नी ओल्गा अब भी हर जगह उसका पीछा कर रही थी। फ्रंसुआज उससे चालीस साल छोटी थी। पिकासो की अगली स्त्री जैकलीन थी जो तलाकशुदा थी। वह फ्रांसुआज से कुछ छोटी ही थी। ओल्गा के अलावे जिस स्त्री की शांत, सौम्य तस्वीरें पिकासो ने बनाई है उनमें जैकलीन भी है। आगे उपेक्षा से त्रास्त फ्रांसुआज ने एक किताब लिखी - लाइफ विद पिकासो। यह वेस्टसेलर रही। इसमें पिकासो की पोलपट्टी खोलकर रख दी गयी थी। पिकासो ने इस पर केस भी किया पर पर मुकदमा हार गया। इसके बाद पिकासो ने फ्रांसुआज की संतानों के लिए अपने घर के दरवाजे बंद कर दिए।
उम्र के नब्बेवें साल में पिकासो ने फिर बहुत से चित्र बनाए स्त्रियों के जिसमें उसकी काम कुंठा उभर कर सामने आई। जैकलीन ने इन चित्रों को बाहर दिखाने से मना कर दिया था सो वे बंद रहे। अब जाकर वह मौत के बारे में सोचने लगा था हर दिन वह सोचता कि चलो एक दिन और मिल गया। आखिर आठ अप्रैल 1973 को पिकासो की मौत हो गयी। उसकी कब्र पर उसी का बनाया एक शिल्प लगाया गया। उसकी मृत्यु पर बहुत से अखबारों ने उसे एक क्रूर ,भावनाशून्य, कामांध व्यक्ति के रूप में याद किया। दिसंबर 1973 में उसकी 1909 की एक कृति द सीटिंग वूमन ने मूल्य के सारे रिकार्ड तोड़ दिए। मूल्य के सारे रिकार्ड पिकासो के प्रिय चित्रकार वॉन गॉग ने भी तोडे़ थे पर जीते जी नहीं, और उसके प्रतिमान पिकासो के उलट थे।
पुस्तक : पिकासो, लेखिका : माधुरी पुरंदरे

सिद्धार्थ जोशी ने कहा…
धन्‍यवाद,

शायद इतना कहना पर्याप्‍त होता...

मैंने पहली बार आपका ब्‍लॉग देखा है। इसमें मुझे प्रभावित किया। इसे मैं अपने फेवरेट में डाल रहा हूं। यकीन मानिए आपका हर लेख में नियमित रूप से पढूंगा। यह ब्‍लॉगिंग का एक अलग आयाम है। आपकी मेहनत और प्रस्‍तुतिकरण श्रेष्‍ठ है।